अब यूपी फतह के लिए भाजपा के पास एक ही विकल्प, योगी होंगे सीएम चेहरा

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नई दिल्ली/नोएडा। उत्तर प्रदेश भाजपा का चुनाव के लिए चेहरा कौन होगा, इस बात पर अब तक पार्टी ने अपना रुख साफ नहीं किया है, लेकिन समय बीतने के साथ पार्टी पर चेहरा देने का दबाव बढ़ता जा रहा है। खबर है कि चेहरे की इस रेस में योगी आदित्यनाथ का नाम सबसे आगे चल रहा है। पार्टी इस मुद्दे पर जल्द ही औपचारिक घोषणा करेगी।

भाजपा के एक वरिष्ठ नेता के मुताबिक, बदले हालात में पार्टी पर अब किसी चेहरे को सामने लाने का दबाव बढ़ गया है। केंद्रीय नेतृत्व के सामने कई चेहरे हैं, जिन पर विचार किया जा रहा है। इनमें केंद्रीय स्तर के दो नेताओं के नाम के साथ ही प्रदेश स्तर के तीन नेताओं के नाम भी शामिल हैं। भाजपा सूत्र की बात पर यकीन करें तो इन नामों में पूर्वांचल के फायरब्रांड नेता योगी आदित्यनाथ का नाम सबसे आगे चल रहा है।

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किन हालातों ने पार्टी को किया मजबूर

उत्तर प्रदेश में भाजपा का कोर वोट बैंक उच्च जातियों ब्राह्मण-ठाकुर-बनिया को माना जाता है। इसके साथ पार्टी को कुछ अन्य पिछड़ी जातियों और कुछ अन्य दलित वर्गों का भी वोट मिलता है। परंतु पिछले लोकसभा चुनाव के परिणामों ने यह साबित कर दिया है कि अगर उसके पास कोई ठोस प्लान होगा तो उसके इस आधार वोट बैंक में विस्तार भी हो सकता है। पार्टी अपने उसी समीकरण को एक बार फिर जमीन पर लाने की कोशिश कर रही है, लेकिन बदले हालात भाजपा का गणित बिगाड़ रहे हैं। मामला इस हद तक खराब है कि पार्टी को अपना वोट बैंक बढ़ाने की तो छोड़िए, अपने कोर वोट बैंक ब्राह्मण और ठाकुर के खिसकने का ही भय सता रहा है।

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कांग्रेस के आरक्षण दांव से ब्राह्मण वोट बैंक खोने का डर

भाजपा सूत्रों के मुताबिक, पार्टी को ब्राह्मणों का वोट बैंक खिसकने का सबसे ज्यादा डर सता रहा है। इसके पीछे कारण यह माना जा रहा है कि यह वह वोट बैंक है, जो अपना वोट खराब नहीं करना चाहता। वह उस तरफ वोट देने की नीति रखता है, जिस पार्टी की सरकार बनाने की उम्मीद ज्यादा होती है। 2007 में बहुजन समाज पार्टी और 2012 में समाजवादी पार्टी की पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने में इसी वर्ग के अहम वोट बैंक का हाथ माना जाता है। इस वोट बैंक के भाजपा के ऊपर से उठे विश्वास के कारण ही अब वह प्रदेश में तीसरे नंबर की पार्टी बनकर रह गर्इ है। पिछले कई चुनाव से उसके सीटों की संख्या पचास का आंकड़ा पार नहीं कर पा रही है।

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इस चुनाव में वोट खिसकने का डर

इस चुनाव में भी भाजपा के साथ ब्राह्मण वोट बैंक के आने के आसार कम ही हैं। हालांकि, पार्टी ने बिसाहड़ा, कैराना, मुजफ्फरनगर और मथुरा कांड को हवा देकर इसी वर्ग को लुभाने की कोशिश की है। हिंदुत्व का मुद्दा उछालकर इस वोट बैंक के दिल को छूने की कोशिश की जा रही है। लेकिन जब से कांग्रेस ने ब्राह्मणों के लिए दस फीसदी आरक्षण घोषित करने की बात कही है, तब से पार्टी के होश उड़े हुए हैं। भाजपा नेतृत्व इस बात को बखूबी जानता है कि ब्राह्मण वर्ग आज की तारीख में नौकरियों को ही अपना प्रमुख व्यवसाय मानता है। नौकरियों में आरक्षण का ही वह मुद्दा था, जिसने ब्राह्मणों को उसकी मूल पार्टी रही कांग्रेस से दूर कर दिया, लेकिन जब से कांग्रेस ने आरक्षण मुद्दे को हवा देकर ब्राह्मणों को एक बार फिर अपने से जोड़ने की कोशिश की है, भाजपा को अपना यह वोट बैंक खोने का डर सता रहा है।

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भाजपा के राष्ट्रीय सचिव बोले, कोर्इ कांग्रेस को गंभीरता से नहीं लेता है

भाजपा के राष्ट्रीय सचिव श्रीकांत शर्मा के मुताबिक, कांग्रेस प्रदेश में चौथे नंबर की पार्टी बनकर रह गर्इ है और कोई उसे गंभीरता से नहीं लेता। वह चाहे जितने फीसदी आरक्षण की घोषणा करे, ब्राह्मण वर्ग जानता है कि यह एक चुनावी स्टंट है और इसलिए वह उसकी तरफ नहीं जाएगा।

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लेकिन एक सच यह भी

कांग्रेस की उत्तर प्रदेश में मौजूदा स्थिति कुछ भी हो, लेकिन आरक्षण का मुद्दा ऐसा है, जिससे पिछले चुनावों में सारे समीकरण बनते बिगड़ते रहे हैं। इसलिए कांग्रेस के दावे को भाजपा के रणनीतिकार भी सिरे से खारिज नहीं कर पाते। कांग्रेस के चुनावी गणीतिज्ञ प्रशांत किशोर को इस बात का पूरा भरोसा है कि उत्तर प्रदेश में सिर्फ ब्राह्मण वोट बैंक खींचकर भी बड़ा फेरबदल किया जा सकता है।

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गठबंधन सरकार होने पर भी कांग्रेस निभाएगी आरक्षण का वादा

यूपी कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता के अनुसार, पार्टी ब्राह्मणों से किया अपना वादा निभाएगी, लेकिन अगर प्रदेश में गठबंधन सरकार की नौबत आती है तो इस सवाल पर कांग्रेस के दिग्गज ने कहा कि जैसी स्थिति बन रही है। अगर कांग्रेस पचास सीटों से ऊपर पाने में भी कामयाब रहती है तो संभावना यही बनेगी कि प्रदेश की कोई भी सरकार कांग्रेस के बगैर नहीं बन सकती। ऐसी किसी भी स्थिति में पार्टी ब्राह्मणों से किया अपना वादा निभाएगी।

ठाकुर वोटबैंक भी संकोच में

दयाशंकर सिंह के प्रकरण पर भाजपा की शिथिलता से ठाकुर लाॅबी पार्टी से नाराज है। उसे लगता है कि बीजेपी ने दयाशंकर सिंह के मुद्दे पर वह स्टैंड नहीं लिया, जिस तरह से उसे लेना चाहिए था। जबकि दयाशंकर सिंह वह नेता माने जाते हैं, जिनके पास युवाओं की लंबी फौज है और जिनकी अगुआई के बिना पार्टी का कोई प्रदर्शन सफल नहीं होता। इससे ठाकुरों के अंदर यह संदेश गया है कि जब पार्टी वोट बैंक के चक्कर में अपने उपाध्यक्ष पद पर बने नेता को बचाने की जरूरत नहीं समझती तो अन्य लोगों के हितों की चिंता वह कैसे करेगी। हालांकि, भाजपा ने डैमेज कंट्रोल करने की कोशिश जरूर की है, परंतु उसकी कोशिश कितनी कामयाब होगी, यह कहा नहीं जा सकता। इसका खुलासा तो चुनाव परिणाम आने के बाद ही हो सकेगा।

योगी को लाकर ब्राह्मण-ठाकुर वोट बैंक संभालने की कोशिश

ब्राह्मणों के लिए योगी और ठाकुरों के लिए दयाशंकर सिंह को लाकर ही भाजपा इन दोनों मुद्दों को एक साथ साधने की कोशिश कर रही है। आदित्यनाथ की कट्टर हिंदू की छवि उन्हें ब्राह्मणों से जोड़ती है और उनका ठाकुर होना राजपूतों को आकर्षित करता है, इसलिए भाजपा के अंदर उन्हें प्रदेश का चेहरा बनाये जाने की तेज कोशिश चल रही है।

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