सांस्कृतिक एकता का प्रतीक “विजयदशमी”

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भारत एक विशाल देश है। इसी भौगोलिक संरचना जितनी विशाल है, उतनी ही विशाल है इसकी संस्कृति। यह इस भारत की सांस्कृतिक विशेषता है ही है कि कोई भी पर्व समस्त भारत में एक जैसी श्रद्धा और विश्वास के साथ मनाया जाता है, भले ही उसे मनाने की विधि भिन्न हो। ऐसा ही एक पावन पर्व है दशहरा, जिसे विजयदशमी के नाम से भी जाना जाता है। दशहरा भारत का एक महत्वपूर्ण त्यौहार है। विश्व भर के हिन्दू इसे हर्षोल्लास के साथ मनाते हैं। यह अश्विन मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को मनाया जाता है। इस दिन भगवान विष्णु के अवतार राम ने रावण का वध कर असत्य पर सत्य की विजय प्राप्त की थी। भगवान राम की पत्नी सीता का अपहरण करके रावण लंका ले गया था। भगवान राम देवी दुर्गा के भक्त थे, उन्होंने युद्ध के दौरान पहले नौ दिन तक मां दुर्गा की पूजा की और दसवें दिन रावण का वध कर अपनी पत्नी को मुक्त कराया। दशहरा वर्ष की तीन अत्यंत महत्वपूर्ण तिथियों में से एक है, जिनमें चैत्र शुक्ल की एवं कार्तिक शुक्ल की प्रतिपदा भी सम्मिलित है। इस दिन लोग नया कार्य प्रारंभ करना अति शुभ माना जाता है। यह शक्ति की पूजा का पर्व है। इस दिन देवी दुर्गा की भी पूजा की जाती है। दशहरे के दिन नीलकंठ के दर्शन को बहुत ही शुभ माना जाता है।

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दशहरा नवरात्रि के बाद दसवें दिन मनाया जाता है। देशभर में दशहरे का उत्सव बहुत ही धूमधाम से मनाया जाता है। जगह-जगह मेले लगते हैं। दशहरे से पूर्व रामलीला का आयोजन किया जाता। इस दौरान नवरात्रि भी होती हैं। कहीं-कहीं रामलीला का मंचन होता है, तो कहीं जागरण होते हैं। दशहरे के दिन रावण के पुतले का दहन किया जाता है। इस दिन रावण, उसके भाई कुम्भकर्ण और पुत्र मेघनाद के पुतले जलाए जाते हैं। कलाकार राम, सीता और लक्ष्मण के रूप धारण करते हैं और अग्नि बाण इन पुतलों को मारते हैं। पुतलों में पटाखे भरे होते हैं, जिससे वे आग लगते ही जलने लगते हैं।

समस्त भारत के विभिन्न प्रदेशों में दशहरे का यह पर्व विभिन्न प्रकार से मनाया जाता है। कश्मीर में नवरात्रि के नौ दिन माता रानी को समर्पित रहते हैं। इस दौरान लोग उपवास रखते हैं। एक परंपरा के अनुसार नौ दिनों तक लोग माता खीर भवानी के दर्शन करने के लिए जाते हैं। यह मंदिर एक झील के बीचोबीच स्थित है। हिमाचल प्रदेश के कुल्लू का दशहरा बहुतप्रसिद्ध है। रंग-बिरंगे वस्त्रों से सुसज्जित पहाड़ी लोग अपनी परंपरा के अनुसार अपने ग्रामीण देवता की शोभायात्रा निकालते हैं। इस दौरान वे तुरही, बिगुल, ढोल, नगाड़े आदि वाद्य बजाते हैं तथा नाचते-गाते चलते हैं। शोभायात्रा नगर के विभिन्न भागों में होती हुई मुख्य स्थान तक पहुंचती है। फिर ग्रामीण देवता रघुनाथजी की पूजा से दशहरे के उत्सव का शुभारंभ होता है। हिमाचल प्रदेश के साथ लगते पंजाब तथा हरियाणा में दशहरा पर नवरात्रि की धूम रहती है। लोग उपवास रखते हैं। रात में जागरण होता है। यहां भी रावण-दहन होता है और मेले लगते हैं।

बंगाल, ओडिशा एवं असम में दशहरा दुर्गा पूजा के रूप में मनाया जाता है।  बंगाल में पांच दिवसीय उत्सव मनाया जाता है। ओडिशा और असम में यह पर्व चार दिन तक चलता है। यहां भव्य पंडाल तैयार किए जाते हैं तथा उनमें देवी दुर्गा की मूर्तियां स्थापित की जाती हैं। देवी दुर्गा की पूजा-अर्चना की जाती है। दशमी के दिन विशेष पूजा का आयोजन किया जाता है। महिलाएं देवी के माथे पर सिंदूर चढ़ाती हैं। इसके पश्चात देवी प्रतिमाओं का विसर्जन किया जाता है। विसर्जन यात्रा में असंख्य लोग सम्मिलित होते हैं।

गुजरात में भी दशहरे के उत्सव के दौरान नवरात्रि की धूम रहती है। कुंआरी लड़कियां सर पर मिट्टी के रंगीन घड़े रखकर नृत्य करती हैं, जिसे गरबा कहा जाता है। पूजा-अर्चना और आरती के बाद डांडिया रास का आयोजन किया जाता है। महाराष्ट्र में भी नवरात्रि में नौ दिन मां दुर्गा की उपासना की जाती है तथा दसवें दिन विद्या की देवी सरस्वती की स्तुति की जाती है। इस दिन बच्चे आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए मां सरस्वती के तांत्रिक चिह्नों की पूजा करते हैं।

तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश एवं कर्नाटक में दशहरे के उत्सव के दौरान लक्ष्मी, सरस्वती और दुर्गा की पूजा की जाती है। पहले तीन दिन धन और समृद्धि की देवी लक्ष्मी का पूजन होता है। दूसरे दिन कला एवं विद्या की देवी सरस्वती-की अर्चना की जाती है तथा और अंतिम दिन शक्ति की देवी दुर्गा की उपासना की जाती है। कर्नाटक के मैसूर का दशहरा बहुत प्रसिद्ध है। मैसूर में दशहरे के समय पूरे शहर की गलियों को प्रकाश से ससज्जित किया जाता है और हाथियों का शृंगार कर पूरे शहर में एक भव्य शोभायात्रा निकाली जाती है। इन द्रविड़ प्रदेशों में रावण का दहन का नहीं किया जाता।

छत्तीसगढ़ के बस्तर में भी दशहरा का बहुत ही अलग तरीके से मनाया जाता है। यहां इस दिन देवी दंतेश्वरी की आराधना की जाती है। दंतेश्वरी माता बस्तर अंचल के निवासियों की आराध्य देवी हैं, जो दुर्गा का ही रूप हैं। यहां यह त्यौहार 75 दिन यानी श्रावण मास की अमावस से आश्विन मास की शुक्ल त्रयोदशी तक चलता है।  प्रथम दिन जिसे काछिन गादि कहते हैं, देवी से समारोह आरंभ करने की अनुमति ली जाती है। देवी कांटों की सेज पर विरजमान होती हैं, जिसे काछिन गादि कहा जाता है। यह कन्या एक अनुसूचित जाति की है, जिससे बस्तर के राजपरिवार के व्यक्ति अनुमति लेते हैं। बताया जाता है कि यह समारोह लगभग पंद्रहवीं शताब्दी में आरंभ हुआ था। काछिन गादि के बाद जोगी-बिठाई होती है, तदुपरांत भीतर रैनी (विजयदशमी) और बाहर रैनी (रथ-यात्रा) निकाली जाती है। अंत में मुरिया दरबार का आयोजन किया जाता है। इसका समापन अश्विन शुक्ल त्रयोदशी को ओहाड़ी पर्व से होता है।

दशहरे के दिन वनस्पतियों का पूजन किया जाता है। रावण दहन के पश्चात शमी नामक वृक्ष की पत्तियों को स्वर्ण पत्तियों के रूप में एक-दूसरे को ससम्मान प्रदान कर सुख-समृद्धि की कामना की जाती है। इसके साथ ही अपराजिता (विष्णु-क्रांता) के पुष्प भगवान राम के चरणों में अर्पित किए जाते हैं। नीले रंग के पुष्प वाला यह पौधा भगवान विष्णु को प्रिय है। दशहरे का केवल धार्मिक महत्व ही नहीं है, अपितु यह हमारी सांस्कृतिक एकता का भी प्रतीक है।

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