प्राचीन रोम की ये कहानी है पिता-पुत्री के प्रेम की सबसे ऊंची और अजीब मिसाल

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रोम के एक इतिहासकार वलेरियस मैक्सिमस ने अपनी किताब Factorum Ac Dictorum Memorabilium में सदियों पहले एक घटना दर्ज की है. ये घटना नैतिकता के विपरीत होते हुए भी मानवीय मूल्यों पर खरी उतरती है. इसीलिए उसने इसे महान पुण्यशीलता या रोमन सम्मान का नाम दिया है.

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पुरातन रोम में साइमन नाम के एक बुज़ुर्ग आदमी को आजीवन भूखे रहने की सज़ा दी गई. उसे एक कालकोठरी में बंद दिया गया और सख्त पहरा लगा दिया गया. राजा का हुक्म था कि जब तक ये मर न जाए इसे न तो कुछ खाने को दिया जाए और न कुछ पीने को. यहां तक कि पानी भी नहीं.

बूढ़े साइमन की एक बेटी थी जिसका नाम पेरू था. वो राजा के पास फ़रियाद ले कर गई कि मेरे पिता अब ज़्यादा देर तक ज़िन्दा नहीं रहेंगे इसलिए रोज़ाना मुझे उनसे मिलने की अनुमति दी जाए. राजा को इसमें कोई आपत्ति नहीं थी. उसने आज्ञा दे दी परन्तु ये हुक्म भी दिया कि मिलने से पहले पेरू की अच्छी तरह से तलाशी ली जाए ताकि वो कोई भी खाने-पीने का सामान अन्दर न ले जा सके. आज्ञा का पालन किया गया. सैनिक उसकी अच्छी तरह से तलाशी लेते. रोजाना पेरू अपने बूढ़े पिता साइमन से मिलने जाती.

रोज़ यही क्रम चलता रहा. काफी दिन बीत गए. जेलर ने साइमन की हालत देखने की सोची. उसको आशंका थी कि साइमन भूख-प्यास से बेसुध और बेहोशी की हालत में मरने की कागार पर होगा. उसे जेल में डाले आज तीसरा हफ्ता पूरा हो गया है. परन्तु जब उसने साइमन को देखा तो हैरान रह गया. ये क्या!! वो तो भला-चंगा नज़र आ रहा था. बिना खाए-पिए जहां उसे हफ्ते-दस दिन में मर जाना चाहिए था, वो आश्चर्यचकित रूप से तीसरे हफ्ते तक न सिर्फ ठीक-ठाक नज़र आ रहा था, परंतु हरकत भी कर रहा था.

हालांकि वो सामान्य से कमज़ोर था, परंतु फिर भी असामान्य रूप से स्वस्थ था. उसको शंका हुई कि पेरू कोई न कोई खाने-पीने की चीज़ ज़रूर इसके लिए ले कर आती है. उसने पेरू और साइमन की मुलाकात देखने की सोची और एक कोने में छिप कर बैठ गया.

पेरू के आने का वक़्त हुआ. वो आई और साइमन से दो चार बातें कीं. उसके बाद जेलर ने जो देखा उससे उसकी आंखें फटी की फटी रह गईं. बड़ी चालाकी से पेरू ने बाहर खड़े सैनिकों की तरफ पीठ कर ली और फिर उसने धीरे से अपनी चोली उठाई और अपना स्तन अपने बूढ़े बाप के मुंह को लगा दिया. बूढ़ा बाप ने बेबसी से आंखें बंद कीं और चुपचाप स्तनपान करने लगा. जेलर ये देख कर हक्का-बक्का रह गया. उसने ऐसा दृश्य देखे जाने की कल्पना तक न की थी. वो बाहर आया और उन दोनों को रंगे हाथों पकड़ लिया. उन दोनों को खूब गालियां दी और पेरू को भी अपने बाप के साथ बंद कर दिया गया.

बात जंगल में आग की तरह फ़ैल गई. राजा को पता चला तो वो बहुत क्रोधित हुआ. उसने उन दोनों को राजदरबार में पेश होने का हुक्म दिया. साइमन और पेरू की खूब थू-थू हुई. लोगों ने कहा कि इन दोनों ने बाप-बेटी के रिश्ते को कलंकित किया है, इसलिए इन्हें सख्त से सख्त सज़ा दी जानी चाहिए.

जहां हर तरफ इन बाप-बेटी के खिलाफ बातें हो रही थीं, वहीं कुछ लोगों ने इसका दूसरा पक्ष भी देखा.उन्होंने कहा कि ये घटना पिता और पुत्री के अतुलनीय प्रेम का उदाहरण है. पेरू का अपने पिता के प्रति प्रेम बिलकुल सच्चा था और वो किसी भी कीमत पर उसकी जान बचाना चाहती थी, इसलिए उसने ऐसा कदम उठाया. धीरे-धीरे लोगों पर इस घटना के सकारात्मक पक्ष का ज़्यादा प्रभाव पड़ने लगा. उनकी पेशी के दिन लोग सड़कों पर उतर आए और राजमहल के बाहर इकठ्ठा हो गए. विद्रोह के डर से और जनभावनाओं को ध्यान में रखते हुए राजा द्वारा भावनात्मक फैसला सुनाया गया, जिसमें सिर्फ पेरू को ही नहीं स्वतंत्र किया गया, बल्कि उसके पिता साइमन को भी दंडमुक्त कर दिया गया.

दोस्तों, अगर किसी काम के पीछे की भावना सही हो तो वो काम अनैतिक होते हुए भी महान कहा जा सकता है. साइमन और पेरू की घटना पिता और पुत्री के प्रगाढ़ प्रेम की सबसे ऊंची मिसाल है.

Illustrations By:gazabpost.com
story source: wikipedia.org

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