राजपूतों का गांव! 44 जवान हो चुके शहीद और 550 जवान अब भी सीमा पर करते हैं देश की रखवाली

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राजपूत इस देश से इतनी मोहब्बत करते हैं कि वो न जान देने से गुरेज़ करते हैं, और न लेने से. इतिहास उठा कर देख लीजिए, जब-जब मातृभूमि पर दुश्मनों ने नापाक़ नज़रें उठाई हैं, राजपूतों ने अपनी ताक़त से उसे वहीं रोक दिया. हालांकि, अब समय पूरी तरह से बदल चुका है. अब देश में लोकतंत्र की बहाली हो चुकी है, मगर राजपूतों के राष्ट्रप्रेम में कोई कमी नहीं आई है. लोकतंत्र में विश्वास रखते हुए राजपूत अपना राज-पाट त्याग, देश सेवा में लग गए.

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Source: Rajputana

देश में कभी भी विपदा आती है, तो सबसे पहले राजपूताना राइफल्स को याद किया जाता है. अगर आपको इनकी देशभक्ति का जज़्बा देखना हो तो उत्तर प्रदेश के मौधा गांव में ज़रूर आइए. इस गांव के हर घर में एक सैनिक रहता है, जो देश के लिए बलिदान देने को तैयार रहता है. आज़ादी के बाद से इस गांव में अब तक 44 जवान शहीद हो चुके हैं. ये हैं देश के सच्चे सपूत, असली राजपूत!

इस गांव के बारे में गृहमंत्री राजनाथ सिंह कुछ इस अंदाज़ में बताते हैं

Source: Rajnathsingh

“वीर सपूतों की धरती ‘मौधा’ पर उत्तर प्रदेश ही नहीं पूरे देश को नाज़ है. मौधा के शहीदों ने भारत माता के स्वाभिमान की रक्षा के लिए अपने को बलिदान कर दिया. मैं यहां के भाई-बहनों को अपना शीश झुका कर नमन करता हूं. प्रथम विश्व युद्ध हो या द्वितीय, हिटलर के नाजीवाद के ख़िलाफ़ लड़ाई हो या फ़िर 1971 और कारगिल का युद्ध, यहां के सैनिकों ने भारत मां के सम्मान पर चोट नहीं पहुंचने दी.”

मौधा गांव में घुसते ही आपको अहसास हो जाएगा कि आप वीरों के गांव में प्रवेश कर रहे हैं. यहां की मिट्टी आपको अहसास करा देगी कि आप एक ऐतिहासिक गांव में हैं. सड़क पर दौड़ते युवा और गांव में ही बने शहीद स्मारक को देख कर आप ख़ुद समझ जाएंगे कि इस मिट्टी में कुछ बात तो है!

प्रथम स्वतंत्रता संग्राम से शुरू हुई थी कहानी

यहां के जवान प्रथम स्वतंत्रता संग्राम से ही देश की रक्षा करने में लगे हुए हैं. आज़ादी के समय इस गांव के जवानों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी. पाकिस्तान युद्ध, चीन युद्ध व 1987 के श्रीलंका गृह युद्ध में भी यहां के जवानों ने भाग लिया था.

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शहीद होने पर मां मुस्कुराती है

आप इस गांव के बारे में इस बात से अंदाज़ा लगा सकते हैं कि जब देश की सीमा पर बेटे के शहीद होने की ख़बर आती है, तो मौधा में मातम नहीं मनाया जाता, बल्कि मां अपने दूसरे बेटे को भी उसी रास्ते पर चलने के लिए भेज देती है.

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550 जवानों का है ये गांव

इस छोटे से गांव में 800 वयस्क जवान हैं, जिनमें 350 से ज़्यादा जवान देश के कई रेजिमेंटों में रह कर देश की सीमाओं की रक्षा कर रहे हैं. 200 से ज़्यादा पूर्व सैनिक इस गांव में रह रहे हैं.

Source: Dainik Jagran

शहीद होने का सिलसिला अभी भी बरकरार है

आज़ादी की लड़ाई के दिनों से भारत माता की आन-बान-शान के लिए मौधा गांव के रहने वाले सैनिकों के शहीद होने का जो सिलसिला शुरू हुआ, वह स्वतंत्रता के बाद आज तक कायम है.

मौधा क्षत्रियों का गांव है, जिसमें मुख्यत: राठौड़ क्षत्रिय निवास करते हैं. यहां के ग्रामीणों के लिए धर्म और कर्म राष्ट्र है. उत्साह और जोश यहां की पहचान है. मानवता और राष्ट्रप्रेम से प्रेरित यह गांव अपने आप में एक ‘देश’ है. ऐसे गांव को हमारा सलाम!

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