आज हर भारतीय की जुबां पर है सिंधू और साक्षी का नाम, लेकिन 100% देने वाला ये खिलाड़ी रह गया गुमनाम

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आज हर भारतीय की जुबां पर है सिंधू और साक्षी का नाम, लेकिन 100% देने वाला ये खिलाड़ी रह गया गुमनाम : 2016 के रिओ-डी-जनेरो में खेले जा रहे ओलंपिक खेल 21 अगस्त को समाप्त हो गए हैं. ओलंपिक में अगर मेडल की बात की जाये तो देश की बेटियों की बदौलत इस बार भारत को 2 मेडल मिले और इसी से देश को संतोष करना पड़ा. एक ओर जहां बैडमिन्टन में पी.वी. सिंधू ने सिल्वर मेडल जीत कर इतिहास रचा, वहीं साक्षी मलिक ने कुश्ती में ब्रॉन्ज़ मेडल जीतकर अपना लोहा मनवाया. लेकिन इनके अलावा भी कुछ ऐसे खिलाड़ी हैं, जिन्होंने मुश्किल हालातों और कई सारी परेशानियों को पार कर रिओ ओलिंपिक तक का सफ़र तय किया.

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आपको बता दें कि ओलंपिक खेलों में कई ऐसे खेल भी हैं, जिसमें हम भाग ही नहीं लेते हैं और कई ऐसे जिसमें हमारे कुछ गिने-चुने खिलाड़ी भाग तो लेते हैं और देश का नाम भी रौशन करते हैं, लेकिन उनके बारे में हमें पता ही नहीं होता या उनके बारे में मीडिया में भी किसी तरह की कोई खबर नहीं आती. ऐसा ही एक खेल है Walk Race, जिसमें इस बार भारत की तरफ से कुल तीन खिलाड़ियों ने भाग लिया था. इन तीनों में से एक खिलाड़ी हैं, मनीष सिंह रावत.

25 वर्षीय मनीष ने 20 किलोमीटर की पैदल दौड़ (Race Walking) के फाइनल में भारत की तरफ से भाग लिया और इस प्रतिस्पर्धा में 1:21:21 के समय के साथ विश्व के कुल 74 खिलाड़ियों में से 13वें स्थान पर जगह बनायी. भले ही मनीष ने कोई मेडल ना जीता हो, लेकिन उन्होंने इस दौड़ में 4 पूर्व वर्ल्ड चैम्पियन, 3 एशियाई चैम्पियन, 2 यूरोपियन चैम्पियन और 2 ओलंपिक मेडल विजताओं को पीछे छोड़ दिया था.

Walk Race यानि कि पैदल दौड़ एक मुश्किल खेल है, जिसके बारे में भारत में बेहद कम चर्चा होती है. लेकिन 2012 के लन्दन ओलंपिक खेलों में जब केरल के एथलीट के.टी. इरफ़ान ने इस खेल में 10वां स्थान हासिल किया, तो इंटरनेशनल एसोसिएशन ऑफ़ एथलेटिक्स फेडरेशन (आइ.ए.ए.एफ.) ने, स्पोर्ट्स अथोरिटी ऑफ़ इंडिया (एस.ए.आइ.) से देश में इस खेल के विकास के लिए कोशिशें करने का आग्रह किया. यह खेल तकनीक, फिटनेस और मानसिक मजबूती का खेल है, जिसमें 20 किलोमीटर की दूरी इस तरह से तय की जाती है कि खिलाड़ी का पांव हर वक्त ज़मीन पर रहे. अगर किसी भी वक़्त खिलाड़ी के दोनों पांव हवा में हों, तो उसे दौड़ना माना जाता है, जिससे उसे डिस्क्वालिफाई करार दिया जा सकता है.

मनीष उत्तराखंड की एक छोटी सी लेकिन प्रसिद्ध जगह बद्रीनाथ से हैं, जो भारत का एक मशहूर तीर्थस्थल है. मनीष के रिओ तक के सफ़र की कहानी बेहद दिलचस्प और प्रेरित करने वाली है. 2002 में जब मनीष 10वीं कक्षा में थे, जब उनके पिता का देहांत हो गया, जिसके बाद परिवार की सारी जिम्मेदारियां मनीष पर आ गयीं. ज़िम्मेदारियों के कारण मनीष को पढ़ाई छोड़नी पड़ी और परिवार की जरूरतों के लिए उन्होंने खेतों में मजदूरी, एक होटल में वेटर की नौकरी से लेकर घर का काम करने (हाउसमेड) और टूरिस्ट गाइड तक का भी काम किया.

भारत में खेलों को कितना बढ़ावा दिया जाता है, यह तो जाहिर ही है और ख़ासकर ट्रैक एंड फील्ड के खेलों की हालत तो और ही ज्यादा खराब है, ऐसे में एक छोटे से पहाड़ी कस्बे से विश्वस्तरीय खिलाड़ियों का आना देश का सौभाग्य ही कहा जाएगा. एक रिपोर्ट के अनुसार, सुविधाओं के अभाव में मनीष ने हिमालय की तलहटी में बसे इस छोटे से कस्बे में बिना किसी की मदद के ट्रेनिंग की. वो हर सुबह 4 बजे उठकर 2 घंटे ट्रेनिंग करते और फिर उसके बाद होटल में जाकर वेटर की नौकरी करते थे. Walk Race में दौड़ने की तकनीक कुछ इस तरह से होती है कि पहली बार देखने पर यह थोड़ा अजीब लग सकता है, इस वजह से इनका हौसला बढ़ाने के बजाय आस-पास के लोग इनका मजाक उड़ाया करते थे. लेकिन ये मनीष का  हौसला और मजबूत इरादे थे, जिसकी वजह से उन्होंने 300 लोगों को पीछे छोड़ कर रिओ ओलंपिक तक का सफ़र तय किया.

आपको बता दें कि ब्रिटेन ने आधिकारिक रूप से एक ओलंपिक मेडल विजेता पर 55 लाख ब्रिटिश पाउंड (लगभग 55 करोड़ रूपए) खर्च किये जाते हैं और चीन में तो बचपन में ही बच्चों की ट्रेनिंग शुरू हो जाती है. वहीं हमारे देश में इस विश्वस्तरीय खिलाड़ी को स्पोर्ट्स कोटे में 10,000 रुपये की पुलिस की नौकरी भी नहीं मिली.

हमारे देश में मनीष जैसी और भी कई प्रतिभाएं हैं, जिन्हें अगर सही ट्रेनिंग और सुविधाएं दी जाएं, तो शायद अगले ओलंपिक में हम हर प्रतिस्पर्धा में मेडल लेकर ही आएंगे और हमें ख़ुशी मनाने के और ज़्यादा मौके मिलेंगे.

Source: topyaps

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