अंतरिक्ष में भारत में सबसे ऊंची छलांग, जानिए कैसे मिली स्वदेशी #Cryogenic तकनीक में #ISRO को महारत…

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isroनई दिल्ली (8 सितंबर):ISRO ने आज स्पेस में एक बार फिर ऊंची छलांग लगाई है। यह छलांग धरती से 36,000 किमी अंतरिक्ष में लगाई है। जी हां भारत ने अपना देसी क्रायोजेनिक इंजन पूर्ण रूप से विकसित कर लिया है। वैसे तो भारत क्रायोजेनिक इंजन से लैस रॉकेट द्वारा तीन बार उपग्रह अंतरिक्ष में भेज चुका है। लेकिन इस बार उसने सबसे भारी 2 हजार किलो से ज्यादा वजनी उपग्रह अतंरिक्ष में भेजा है।

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भारतीय अंतरीक्ष अनुसंधान संस्थान (ISRO) ने गुरुवार को सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल GSLV-F05 के जरिए मौसम का सटीक अनुमान लगाने वाला एडवांस सैटेलाइट INSAT-3DR को आंध्र प्रदेश के सतीश धवन स्पेस सेंटर से सफलतापूर्वक लॉन्च कर दिया है। प्रक्षेपण शाम 4.50 बजे किया गया। इससे पहले तकनीकी गड़बड़ी के कारण प्रक्षेपण 40 मिनट के लिए टालना पड़ा।

INSAT-3DR एक मॉडर्न सैटेलाइट हो जो रात में भी मौसम की सटीक जानकारी देगा। सैटेलाइट हिंद महासागर के रेडियो मैसेज को पहचानकर कोस्ट गार्ड को फौरन अलर्ट करेगा। जिससे समुद्र में आपदा में फंसे लोगों तक जल्द मदद पहुंचाई जा सकेगी।

– इसरो ने बताया कि गुरुवार को लॉन्च हुए इनसैट-3डीआर का वजन 2,211 किलो है।
– इसका कंट्रोल कर्नाटक के हासन स्थित इसरो सेंटर के पास होगा।
– सैटेलाइट को पृथ्वी के आर्बिट में पहुंचने में 17 मिनट का समय लगा।
– ये पहला मौका है जब इसरो ने ज्यादा वजनी सैटेलाइट स्पेस में भेजा है।
– सैटेलाइट लॉन्चर GSLV-F05 की ये चौथी उड़ान है।
– सैटेलाइट आईएमडी दिल्ली, अहमदाबाद सेंटर को जानकारी भेजेगा।
– इस मिशन पर 400 करोड़ रुपए खर्च हुए हैं।
– यह सैटेलाइट विदेश से खरीदकर लॉन्च करवाया जाता तो इससे दोगुना खर्च होता।

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INSAT-3DR की खूबियां…
– इसमें छह चैनल इमेजर व 19 चैनल साउंडर उपकरण लगे हैं।
– इनसे रात में भी बादलों और धुंधले आकाश पर साफ नजर रखी जा सकती है।
– थर्मल इंफ्रारेड बैंड से समुद्र के तापमान को सटीक मापा जा सकेगा।
– 1,700 वाट सौर पैनल से खुद बनाएगा ऊर्जा।
– डाटा रिले ट्रांसपोंडर और सर्च और रेस्क्यू ट्रांसपोंडर के जरिये बचाव अभियानों में करेगा मदद।
– सूचना का आदान-प्रदान बेहद तेज होगा।
– INSAT-3DR इसरो के द्वारा बनाया गया चौथा वेदर सैटेलाइट है।
– इससे पहले 2002 में कल्पना-1, 2003 में इनसैट-3ए और 2013 में इनसैट-3डी लॉन्च हो चुके हैं।

ज्यादा वजनी उपग्रह की पहली उड़ान…
– वैसे तो क्रायोजेनिक इंजन से लैस रॉकेट तीन बार उपग्रह भेजे जा चुके हैं।
– जनवरी 2014 और अगस्त 2015 में डी5 और डी6 अभियानों में भी जीएसएलवी में क्रायोजेनिक इंजन इस्तेमाल हुआ।
– क्रायोजेनिक इंजन के उन्नत रूप को जीएसएलवी में तीसरे स्टेज में लगाया जाएगा।
– इस इंजन में ईंधन के रूप में तरल हाइड्रोजन और ऑक्सीजन का इस्तेमाल होता है।
– भारत छठा ऐसा देश है जिसने क्रायोजेनिक रॉकेट इंजन विकसित किया है।
– इसी इंजन से अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा चांद तक पहुंची थी।

स्वदेशी क्रायोजेनिक इंजन का हुआ इस्तेमाल…
– क्रायोजेनिक इंजन में फ्यूल के तौर पर लिक्विड हाइड्रोजन और ऑक्सीजन का यूज होता है। यह लिक्विड रॉकेट इंजन की तुलना में बेहतर होता है।
– भारत छठा ऐसा देश है जिसने क्रायोजेनिक रॉकेट इंजन डेवलप किया है। इसी इंजन से अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा के स्पेस व्हीकल अंतरिक्ष में पहुंचते हैं।
– क्रायोजेनिक इंजन को जीएसएलवी में तीसरे स्टेज में लगाया गया है। अगले साल चंद्रयान-2 की लॉन्चिंग में भी इसी इंजन का इस्तेमाल होगा।

पीएसएलवी बनाम जीएसएलवी…
– इसरो इससे पहले ध्रुवीय उपग्रह प्रक्षेपण यान(पीएसएलवी) की ममद से उपग्रह प्रक्षेपण में काफी सफलता प्राप्त की है।
– जीएसएलवी अपने डिजाइन और सुविधाओं में पीएसएलवी से बेहतर है।
– यह तीन श्रेणी वाला प्रक्षेपण यान है, जिसमें पहला चरण सॉलिड, दूसरा लिक्विड प्रापेल्ड तथा तीसरा क्रायोजेनिक इंजन आधारित होता है।
– जीएसएलवी का पहले और दूसरे चरण में पीएसएलवी में इस्तेमाल होने वाली तकनीक ही ली गई है।
– तीसरे चरण के लिए इसरो ने स्वदेशी तकनीक से निर्मित क्रायोजेनिक इंजन का आविष्कार किया है।
– इससे पहले जीएसएलवी प्रक्षेपण यान के तीसरे चरण के लिए इसरो रूस निर्मित क्रायोजेनिक इंजन का प्रयोग कर रहा था।

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