मौत को मात देकर ज़िन्दगी को एक नया आयाम दिया सेना के इन तीन बहादुर जवानों ने

430

672339235

आकर्षक ऑफर के लिए यहाँ क्लिक करें

वो जो सरहद पर हर वक़्त डटे रहते हैं, असल में वो ही हीरो हैं. इनके हौसले इतने बुलंद होते हैं कि मौत भी इनसे डरती है और अगर आ भी जाती है, तो इन्हें फ़र्क नहीं पड़ता. ज़िन्दगी को अपने अंदाज़ में जीने वाले इन जवानों से हमें जो प्रेरणा मिलती है, वो शायद ही कहीं और मौजूद हो. आज हम आपको सेना के ऐसे तीन बहादुर जवानों के बारे में बताने जा रहे हैं, जिन्होंने मौत को चुनौती दी और ज़िन्दगी को नया आयाम दिया. 

1. फ्लाइट लेफ्टिनेंट परीक्षित हस्तेकर


source: nbt

8 नवंबर 2010 को सियाचिन में भारतीय वायुसेना में फ्लाइट लेफ्टिनेंट परीक्षित हस्तेकर चीता हेलिकॉप्टर के जरिए भारतीय सैनिकों तक रसद पहुंचाने जा रहे थे. हेलिकॉप्टर टेकऑफ के तुरंत बाद दुर्घटनाग्रस्त हो गया. 22 हजार फीट की ऊंचाई से नीचे गिरे हस्तेकर के सिर में गंभीर चोट आई और वह कोमा में चले गए. करीब 30 दिन बाद वह कोमा से बाहर आए, लेकिन दिमागी चोट के कारण वह शारीरिक-मानसिक तालमेल खो चुके थे. इसके बावजूद परिवार की मदद से हस्तेकर हालात से लड़ने लगे। रिकवरी के संकेत मिलने लगे थे. करीब 8 महीने लगे, उन्होंने सपोर्ट से खड़े होने की कोशिश की. दो साल खत्म होते-होते उन्होंने सारा निजी काम करना शुरू कर दिया था. रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर ने हाल में एक समारोह में हस्तेकर के हौसले की तारीफ करते हुए कहा कि वह एक बार फिर से हेलिकॉप्टर उड़ाने की इच्छा रखते हैं.

कारगिल में घायल होने के बाद ब्लेड रनर बने मेजर डी.पी. सिंह


source: twimg

1999 में कारगिल में हुई जंग में मोर्टार लगने के बाद मेजर डी.पी. सिंह बुरी तरह घायल हो गए. अस्पताल लाए जाने पर डॉक्टरों ने पहले तो उन्हें मृत घोषित कर दिया, लेकिन बाद में पता चला कि उन्होंने दायां पैर खो दिया है. जब वह ज़िन्दगी की कड़ियों को दोबारा से जोड़ने लगे तो उन्हें दौड़ने की इच्छा हुई. उन्होंने तीन मैराथन में हिस्सा लिया, फिर उन्हें साउथ अफ्रीका के ब्लेड रनर ऑस्कर पिस्टोरियस से फाइबर ब्लेड से बने कृत्रिम पैर की जानकारी मिली.

सेना ने मेजर डी.पी. सिंह को यह ब्लेड मुहैया कराया. इस ब्लेड से हाफ मैराथन दौड़ने वाले वह पहले भारतीय बने. अपने हौसले की बदौलत उन्हें ‘भारत का ब्लेड रनर’ कहा गया.

मुंह में पेंसिल रखकर लिखना सीखा फ्लाइंग अफसर एम.पी. अनिल कुमार ने


source: oneindia

फ्लाइंग अफसर एम.पी. अनिल कुमार भारतीय वायुसेना में मिग 21 के पायलट थे. 1988 में मोटरसाइकिल से हुए एक हादसे में 24 साल की उम्र में उनके शरीर में गर्दन से नीचे के हिस्से को लकवा मार गया. इसके बाद उन्हें पूरी जिंदगी व्हील चेयर पर बितानी थी..मन में नेगेटिव विचार आने लगे तो उन्होंने इससे लड़ने का फैसला किया. उन्होंने नई ज़िन्दगी मीडिया में कमेंटेटर के तौर पर शुरू की.

मुंह में पेंसिल रखकर वह लिखने की कोशिश करने लगे. उनका पहला निबंध एयरबॉर्न टू चेयरबॉर्न था, जिसे काफी सराहा गया. महाराष्ट्र और केरल में इसे स्कूली पाठ्यक्रम में शामिल कर लिया गया. 26 साल वीलचेयर पर बिताने के बाद अनिल कुमार का 2014 में निधन हो गया. हाल में उनकी ज़िन्दगी पर आधारित एक किताब बॉर्न टु फ्लाई आई, जिसके लेखक एयर कमोडोर नितिन साठे का मानना है कि एम.पी. अनिल कुमार की ज़िन्दगी कई लोगों के लिए प्रेरणा का स्रोत रही और आगे भी रहेगी.

इन जवानों ने साबित किया कि वे सरहद पर ही नहीं, निजी ज़िन्दगी में भी असली सैनिक हैं.

Source: Nbt

loading...