शेयर करें ताकि दुनिया जान सके कि एक यहूदी ने मुसलमानों के सामने घुटने टेक दिये !

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aryaraghvendra

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नमस्कार मित्रों,

मैं ३० दिनों  बाद फ़ेसबुक पर लौटा हूं. फ़ेसबुक ने मुझे इतनी अवधि के लिए “ब्लॉक” कर दिया था, जिसमें मेरी टाइमलाइन तो यथावत थी, लेकिन मैं किसी भी तरह की एक्ट‍िविटी में सम्मलित नहीं हो सकता था. मेरे कुछ कमेंट्स को भी हटा दिया गया. २३ जून को सुबह जब मैं जागा तो मेरा अकाउंट लॉग आउट था और जब मैंने लॉग इन करने की कोश‍िश की तो फ़ेसबुक ने मुझे बताया कि मेरे एक “आपत्त‍िजनक पोस्ट” पर दंडस्वरूप मेरी एक्टि‍वि‍टीज़ को 30 दिनों के लिए “ब्लॉक” किया जा रहा है. मुझे अफ़सोस है कि मैं उस वाहियात मैसेज का स्क्रीनशॉट नहीं ले सका.

मेरा वह “आपत्त‍िजनक पोस्ट” क्या था?

फ़ेसबुक ने मुझे बताया कि मैंने एक समुदाय विशेष के संदर्भ में “Non existent God” शब्द का इस्तेमाल किया था. मुझे यह इल्ज़ाम सुनकर झटका लगा! सो व्हाट!! मैंने ठीक ऐसा ही कहा था. और मैं इसको उस समुदाय के संदर्भ में एक बार फिर दोहरा रहा हूं : “Non existent God!” अब फ़ेसबुक चाहे तो मुझे एक बार फिर से ब्लॉक कर सकता है!

मार्क जुकरबर्ग, तुम “intolerant” कब से हो गये? फ़तवे कब से जारी करने लगे? तुम हार्वर्ड की पैदाइश हो या हिजबुल की? तुम क्या फ़ेसबुक पर इस्लामिक मुल्कों वाला ईशनिंदा क़ानून लागू करना चाहते हो? तुम्हारी परेशानी क्या है? मैं एथीस्ट हूं, “blasphemous” हूं. आज से नहीं, सालों से हूं. ये मेरी फिलॉस्फ़ी है, तुम्हें इससे कोई प्रॉब्लम है? तुम मुझे सिखाओगे कि मुझे किस तरह से सोचना है?

दुनिया में करोड़ों लोग ईश्वर में विश्वास नहीं रखते. तुम उन सबका क्या करोगे? फ्रेडरिक नीत्शे ने डेढ़ सौ साल पहले ईश्वर की मृत्यु की घोषणा की थी. तुम नीत्शे की किताबों पर बैन लगवाओगे? बौद्ध धर्म के अनुयायी अनीश्वरवादी हैं और सनातन परंपरा में भी चार्वाक हुए हैं.

और चूंकि भारत इस्लामिक मुल्क नहीं है इसलिये बुद्ध को यहां पूजा गया और चार्वाकों को भी सूली पर नहीं लटकाया गया. तुम सोशल मीडिया को एक इस्लामिक स्टेट बना देना चाहते हो? तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई मुझे ब्लॉक करने की?

क्या मेरी टिप्पणी “फ्रीडम ऑफ़ स्पीच” के दायरे में नहीं थी? क्या उससे किसी की धार्मिक आस्था को ठेस पहुंच रही थी और क्या इस ठेस का कोई महत्व है भी? क्या इसके बजाय मुझे हिंदू धर्म की किसी देवी को “वेश्या” कहकर पुकारना चाहिए था, ताकि तुम ताली बजाकर इसका जश्न मनाते?

क्या मुझे हिंदू धर्म की किताबें जलानी चाहिए थी और उसके मिथकों का भौंडा उपहास करना था, जिसे आख़‍िरकार धर्मनिरपेक्ष बौद्ध‍िकता के दायरों के अनुकूल समझा जाता? फ़ेसबुक पर यह निरंतर चलता रहता है, कितनों को तुमने ब्लॉक किया? तुम एक “मैन्युअल” ही क्यों नहीं जारी कर देते कि “किसी को भी” “किसी के भी बारे में” “कुछ भी” कहने का हक़ है, लेकिन इस्लाम के खिलाफ़ कुछ भी कहा तो तुम्हें ब्लॉक कर दिया जाएगा. दुनिया को भी तो पता चले कि एक यहूदी ने मुसलमानों के सामने घुटने टेक दिये!!

तो जनाब, क़िस्सा ये है कि इस्लाम के ख़िलाफ़ बोलने पर कठमुल्ले आपके लिये फ़तवे जारी करेंगे, सेकुलर बुद्ध‍िजीवी आप पर टूट पड़ेंगे और मार्क जुकरबर्ग आपको ब्लॉक कर देगा : वह भी उस दिन, जिस दिन फ्रांस में 84 लोगों को ट्रक के पहियों के नीचे कुचलकर मार दिया जाएगा. यह सब सुनकर शर्म आ रही है या नहीं, “फ्रीडम ऑफ़ स्पीच” की भजन-मंडलियो!?

बहरहाल : जेएनयू छाप क़ाहिल बौद्ध‍िकों, हिंदी के पुरस्कार-लौटाऊ लीचड़ लेखकों, मीडिया के टुकड़खोर एंकरों और इस्लामिक आतंकवाद के समर्थक कम्युनिस्टों की ओर मुख़ातिब होकर मैं उनसे पूछना चाहूंगा कि लोकतांत्रिक अभिव्यक्ति के दमन के इस मामले में तुममें से कितने मेरे पक्ष में खड़े हो रहे हो? और अगर नहीं, तो क्यों नहीं? यह पोस्ट तुम्हारी परीक्षा है. और “Non existent God” से डर जाने वाले मार्क जुकरबर्ग, लानत है तुम पर! कहीं जाकर डूब मरो!

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