जो कहते है युद्ध करो…शायद उन्हें नहीं पता कि जब युद्ध होता है, तब सिर्फ़ सैनिक नहीं मरते

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‘भारत-पाकिस्तान के बीच युद्ध होने वाला है‘. बहुत हल्की लाइन लग रही होगी आपको ये. पर ये मामला इतना हल्का है नहीं. इस लाइन से बहुत कुछ ऐसा जुड़ा है, जिसे तोड़े जाने पर बहुत कुछ टूट सकता है. शाम को न्यूज़ चैन्लस पर होती बहसें, सुबह मोहल्ले के पार्क में होती चर्चाएं बस पाकिस्तान और भारत तक सिमट कर रह गई हैं फिलहाल. आखिर क्यों हो रहा है ऐसा? इस सवाल का जवाब सबके लिए अलग-अलग है. हर कोई अपने ढ़ंग से इस मसले पर अपनी राय रखता है. किसी को देशभक्ति प्यारी है, तो किसी का परिवार कभी युद्ध के दौर से गुजरा है.

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Source: Madrasregiment

हालिया दौर में युद्ध की एक पृष्ठभूमि बन गई है. उस ज़मीन पर बहुत से पढ़े-लिखे लोग अपने-अपने विचारों के हथियारों से लोगों को प्रभावित करने पर तुले हुए हैं. ये हालांकि वैचारिक युद्ध है. जो सोशल मीडिया पर ज़्यादातर देखने को मिल रहा है. भारत-पाकिस्तान के बीच होता युद्ध कभी वैचारिक युद्ध नहीं होता.

ये एक पत्र है. उस बच्ची का जिसने कारगिल युद्ध के दौरान जो दर्द अपने आसपास देखा, वो लिखा.

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ऐसा ही कोई पत्र पाकिस्तान की बेटी ने भी लिखा होगा. बहुत से ऐसे पत्र कहीं कागज़ों में लिख गये होंगे, कहीं यादों में.

वो लोग जो कहते हैं Let The War Begin!

ये कौन लोग हैं? जो बिना सोचे समझे लड़ाई के बारे में इतनी आसानी से, इतनी नरमी से बोल जाते हैं. युद्ध एक ऐसा शब्द है, जो सीने से निकले तो कई ज़ख्म छोड़ जाये. पर ये कौन लोग हैं, जिन्हें इस शब्द को बोलते हुए ज़रा भी हलचल नहीं होती. लगता है ये लोग इस शब्द से बहुत दूर पले-बढ़े हैं.

युद्ध में किसी को खोना क्या होता है शायद ये जानते ही नहीं, या जानते हैं पर मानते नहीं. उड़ी में हुए आतंकी हमले में 18 सैनिक शहीद हुए, पर उनके साथ उनका परिवार और वो तमाम किस्से भी शहीद हो गये, जो उन लोगों को ज़िंदा रखे हुए थे. कोई आदमी अकेला कभी नहीं मरता. उसके साथ जुड़े लोग भी मरते हैं. कई सदियों तक वो मरे रहते हैं. लगता है जिन लोगों ने युद्ध में अपना कुछ-कुछ खोया है, वो मरे-मरे ही जीते हैं.


Source: IndiaToday

बस हम युद्ध के विरोध में खड़े हैं. ना हमारा मकसद पाकिस्तान से है, ना भारत से. प्लीज़ देशद्रोही का इल्ज़ाम मत लगाना. वॉर में हमेशा से ही लोग मरे हैं. ये एक ऐसा व्यवसाय है, जो हथियारों और लाशों के सिर पर चलता है. ये शब्द (युद्ध) लोगों की ज़ुबान से इतनी आसानी से निकल रहा है, वो इसके पीछे की असंवेदनशीलता को दिखाता है. उस मां के कंठ से ये शब्द नहीं निकलेगा जिसका बेटा शहीद हुआ हो. उस मां का कंठ युद्ध में कितने दबे कंठों को बस कुछ मिनट में ही भांप लेगा. वो कंठ बदला लेना नहीं चाहता, क्योंकि बदले से बदला पैदा होता है.

अब युद्ध होगा तो क्या होगा?

एक पत्रकार वो भी हैं, जिन्होंने अपने बेतुके Panel Discussion से आम जनता को इस बात के लिए प्रेरित कर दिया है कि युद्ध होगा. लगाता है जैसे कि भारत युद्ध कर देगा, तो पाकिस्तान तो मानो अदना-सा देश है जो चुटकियों में तबाह हो जायेगा.

नहीं साब, पाकिस्तान को तो दस मिनट में उड़ा देंगे.

अरे दस मिनट तो बहुत ज़्यादा हैं भाई.

दोनों देशों के पास परमाणु बम हैं. जो लोग युद्ध की बात कर रहे हैं शायद ही उनका कोई किसी सीमा पर रहता हो. शायद ही उन्होंने किसी अपने की शहादत को देखा हो, शायद ही युद्ध में उन्होंने अपना कुछ खोया हो. कोरी बातें वही पत्रकार, वही पढ़े-लिखे लोग कर रहे हैं, जिन्होंने सीमा में बटे मुल्कों का दर्द जाना ही नहीं. मेरी इस टिप्पणी के बाद शायद ये पढ़ने वाले मुझे पाकिस्तानी बताने लगें. कभी इस बात पर गौर किया है कि जब हमारे घर का कोई सदस्य मर जाता है तो उसके साथ कितने लोग मरते हैं. बहुत से सपने टूट जाते हैं, बहुत से बातें रह जाती हैं. कई दिनों तक घरों में कढ़ाई नहीं चढ़ती. अब जब युद्ध होगा तो कितने लोग मरेंगे. कितना कुछ जो मर जायेगा. जो इंसान ये सोचता है वो इंतकाम को इंतकाम से नहीं मिटायेगा. वो इस पहलू को दोनों ओर से देख सकता है.


Source: Dawn

दरअसल बात यही है कि फैसला लेना बड़ा ही मुश्किल काम है. हमारे अखबारों में हमारे सैनिकों की शहादत छपती है, उनके अखबारों में उनके सैनिकों की शहादत छपती है. अखबार, टीवी, बहसों और इन शब्दों की दुनिया से थोड़ा सा हटकर खड़े होकर देखिए. आपको एक सैनिक या दुश्मन नहीं, कोई अपना मरता दिखेगा. चाहे वो पाकिस्तान का हो, या फिर भारत का. मैं जानता हूं कि देश की आंतरिक और बाहरी सुरक्षा के लिए कई बार कड़े फैसले लेने पड़ते हैं और कई बार सियासतें अपनी ज़ुबान की जवाबदेही देने के चलते ऐसे कदम उठाती हैं.


Source: Jesus

तहेदिल से दुख है कि 18 सैनिक ही नहीं मरे, बल्कि कई परिवार मर गये. अब क्या करना चाहिए. ये तय हम दफ्तरों में बैठे टाइपिंग करते लोग नहीं करेंगे. बस हम परेशान हो सकते हैं. अपनी भड़ास कभी पाकिस्तान पर, तो कभी कश्मीर पर, तो कभी अपनी और उधर की सरकारों पर उतार सकते हैं. लेकिन याद रहे कि इन्हीं पढ़े-लिखे लोगों की ये भड़ास किसी का विचार बन सकता है. शायद युद्ध होगा नहीं, युद्ध तो हो रहा है.

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