मोदी सरकार की नीतिओं का असर, देश के लिए वापस लौट रहे हैं Scientists

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ये है स्वदेस 2.0, विदेश की बेहतर नौकरी और लाइफ छोड़ देश के लिए वापस लौट रहे हैं Scientists

मोदी सरकार की नीतिओं का असर, देश के लिए वापस लौट रहे हैं Scientists : 2004 में जब आशुतोष गोवारिकर ने अपनी सबसे बेहतरीन फिल्मों में से एक स्वदेस को Theaters में उतारा था, तो लोग समझ नहीं पाए थे कि आखिर नासा में काम करने वाला कोई साइंटिस्ट क्यों एक बेहतर Environment छोड़ कर वापस भारत आएगा? फ़िल्म अच्छी थी, लेकिन लोगों के पल्ले शायद अब पड़ रही है.

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ऐसा इसलिए क्योंकि पिछले कुछ सालों में भारत में हो रही है साइंटिस्ट्स की वतन-वापसी. ये बात हर कोई जानता है कि देश से बहुत सारे साइंटिस्ट्स बेहतर करियर और संभावनाओं के चलते बाहर चले जाते हैं, लेकिन अब जा कर ऐसा हुआ है कि उनमें से कई देश वापस आ रहे हैं.

मोदी सरकार की नीतिओं का असर, देश के लिए वापस लौट रहे हैं Scientists
मोदी सरकार की नीतिओं का असर, देश के लिए वापस लौट रहे हैं Scientists

इसका सबसे बड़ा कारण है इनके लिए देश में ही ऐसी Opportunities का होना, जिसके लिए इन्हें बाहर जाने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी. वैज्ञानिकों को देश के ही किसी इंस्टीट्यूट या अच्छे रिसर्च सेंटर में परमानेंट फैकल्टी के तौर पर काम मिल रहा है, जो अपने आप में एक लंबी छलांग है. बाहर रह कर वो बड़े साइंटिस्ट्स के साथ काम तो कर पाते हैं, लेकिन परमानेंट फैकल्टी नहीं बन पाते.

CSIR के पूर्व डायरेक्टर-जनरल आर.ए. माशेलकर का कहना है कि, ‘भारत पहले ब्रेन ड्रेन की स्थिति में था, यानि यहां से सारा टैलेंट बाहर जा रहा था, फिर हुआ ब्रेन गेन और अब ब्रेन सर्कुलेशन हो रहा है, यानि वो टैलेंट यहां से पढ़ कर, विदेशों में सीख कर, देश वापस आ रहा है बेहतर Opportunities की तलाश में. भारत धीरे-धीरे संभावनाओं का देश बन रहा है और वो ऐसे टैलेंट को अगर चैलेंजिंग काम दे, तो फिर क्या कहने!

डिपार्टमेंट ऑफ़ साइंस एंड टेक्नोलॉजी के आशुतोष शर्मा का कहना है कि ब्रेन ड्रेन को ब्रेन गेन में बदलने के लिए ऐसे माहौल की ज़रूरत है, जो बच्चों को ठीक पीएचडी के बाद मिल सके और तब भी जब वो विदेश से कुछ सीख कर भारत आएं.

रिपोर्ट्स के हिसाब से भारत धीरे-धीरे रिसर्च और डेवलपमेंट में अपना नाम बना रहा है. दुनिया की तक़रीबन 1000 कंपनियों ने भारत में अपने R&D सेंटर स्थापित किये हैं, जिससे हमारे भविष्य और Opportunities का पता चलता है. इन सेंटर्स में लगभग 2 लाख साइंटिस्ट्स काम कर रहे हैं, जिनमें एक-तिहाई हिस्सा बाहर से आये वैज्ञानिकों का है.

देश के लिए कुछ करने के प्रण से वापसी करने वाले शशि कुमार क्या कहते हैं?

इस वक़्त दिल्ली के International Centre for Genetic Engineering and Biotechnology के ग्रुप लीडर शशि कुमार 1998 में दिल्ली से पीएचडी करने के बाद सीधे अमेरिका गए. वहां 12 साल रहे, जहां उन्होंने University of Virginia, Charlottesville, University of Central Florida, Orlando, University of California, Berkeley जैसी बड़ी यूनिवर्सिटीज़ में काम किया.

मेरे लिए वापस आना बहुत मुश्किल था, 2010 में भारत आने से पहले मैं देश के Science प्रोग्राम में कुछ हिस्सेदारी देना चाहता था, लेकिन बस ये हो नहीं पा रहा था. भारत में काम करने की सबसे अच्छी बात ये है कि लगता है अपने देश के लिए कुछ कर रहे हैं. लेकिन यहां अभी भी साइंस और रिसर्च को लेकर बहुत काम होना बाकी है. हालांकि सरकार कोशिश कर रही है, लेकिन उसे और प्रयास करने होंगे, ताकि टैलेंट को देश से बाहर जाने से रोका जा सके’.

मोदी सरकार की नीतिओं का असर, देश के लिए वापस लौट रहे हैं Scientists

Source: TOI Featured is a used for representation only, source: Imgur

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