एक सलाम यासीन पठान को, जो पिछले 34 सालों से 28 मंदिरों की देखभाल कर रहे हैं

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पश्चिम बंगाल के रहने वाले यासीन पठान सांप्रदायिक सौहार्द की अनूठी मिसाल पेश कर रहे हैं. वह पिछले 34 साल से हिंदू मंदिरों के संरक्षण और उनके जीर्णोद्धार को लेकर एक आंदोलन का नेतृत्व कर रहे हैं. यासीन एक रिटायर्ड स्कूल चपरासी हैं और जीवन का अहम हिस्सा मंदिरों की देखभाल करने में लगा चुके हैं. वे 34 सालों से 28 मंदिरों का ध्यान रख रहे हैं.

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source: dainikbhaskar

यासीन को 1993 में सांप्रदायिक सद्भाव बढ़ाने के लिए कबीर पुरस्कार से नवाजा गया था, हालांकि पिछले साल उन्होंने देश में बढ़ती असहिष्णुता का हवाला देते हुए इसे लौटा दिया था.

Pathra Temple, Source: blogspot

लेकिन राह इतनी आसान नहीं थी. यासीन को शुरुआती समय में इस काम को लेकर कई परेशानियों का सामना भी करना पड़ा था. मिदनापुर के पाथरा गांव में स्थित 300 साल पुराने इन मंदिरों का संरक्षण यासीन ने 1973 में शुरू किया था. उन्होंने बताया कि बचपन में वह अकसर इन मंदिरों को देखने जाते थे और यहीं से उन्हें इनसे जुड़ने की प्रेरणा मिली. 

Pathra Temple, Source: blogspot 

यासीन ने बताया कि लोग इन मंदिरों में आते थे औऱ यहां से ईंट-पत्थर ले जाते थे. तभी उन्होंने इन मंदिरों के संरक्षण की सोची और निगरानी करने लगे.

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निगरानी के दौरान वह किसी को ईंट-पत्थर ले जाने से मना करते, तो वे उन्हें दूसरे धर्म का बताकर उनका विरोध करते थे. ऐसे में भी यासीन हार नहीं माने और अपनी तरफ से कोशिश करते रहे.

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1992 में उन्होंने लोगों को इस संबंध में जागरूक करने के लिए ‘पाथरा आर्कियोलॉजी कमिटी’ का गठन किया. हिंदू, मुस्लिम और आस-पास के आदिवासियों को भी उन्होंने इस समिति का हिस्सा बनाया. 2003 में पुरातत्व विभाग ने इन मंदिरों के रख-रखाव का जिम्मा संभाला.

जिस हौसले और नेक नीयत से यासीन अपना काम करते आ रहे हैं, सचमुच हमारे देश की पहचान इन जैसे लोगों के कारण ही है. उन्हें ग़ज़बपोस्ट की तरफ से सलाम.

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