आनन-फानन में नहीं बल्कि पीएम मोदी पिछले दो साल से कर रहे थे काले-धन पर शिकंजा कसने की तैयारी

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अमेरिका में राष्ट्रपति चुनाव के नतीजों के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के एक ऐतिहासिक फैसले ने सारी सुर्खियां बटोर ली. जहां 500 और 1000 के नोटों पर पाबंदी को ब्लैक मनी के खिलाफ सर्जिकल स्ट्राइक माना जा रहा है वहीं इसे देश के कैशलेस इकॉनोमी की तरफ एक उभरते हुए कदम के तौर पर भी देखा जा रहा है. ये फैसला PayTM जैसी कंपनियों के लिए बड़ी सौगात लेकर आ सकता है.

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हालांकि बड़े नोटों पर पाबंदी देश के इतिहास में पहली घटना नहीं है. इससे पहले ब्रिटिश सरकार 1946 में 1000 के नोट और 10000 के नोट पर पाबंदी लगा चुकी है. 1978 में इमरजेंसी के ठीक बाद पूर्व प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई ने भी 1000, 5000 और 10000 के नोटों पर पाबंदी लगाई थी. इंदिरा गांधी ने भी 70 के दशक में कुछ इसी तरह का कदम उठाने का फैसला किया था लेकिन यह सूचना लीक हो गई और बाद में इसे लागू नहीं किया जा सका.


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खास बात ये है कि अपना कार्यकाल के शुरु होने के फौरन बाद ही मोदी सरकार ने कई ऐसे फैसले लिए हैं, जो साबित करते हैं कि काले धन के खिलाफ मोदी पूरी तैयारियों के साथ आए हैं.

SIT का गठन : पीएम मोदी ने अपनी पहली ही कैबिनेट मीटिंग में ही काले धन से लड़ने के लिए सुप्रीमकोर्ट की देख-रेख में एक स्पेशल इंवेस्टिगेशन टीम का गठन किया था. यह टीम अब तक रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया के साथ मिलकर कई निर्णायक फ़ैसले ले चुकी है.


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जन धन योजना: प्रधानमंत्री ने इसके तुरंत बाद एक ऐतिहासिक फैसला लेते हुए 28 अगस्त 2015 को ‘जन धन योजना’ की शुरुआत की. इस योजना का मुख्य मकसद था गरीब और निम्न वर्ग के लोगों को बैंकों से जोड़ना. अभी तक इस योजना से 25.45 करोड़ लोगों का बैंकों में खाता खुल चुका है और 45 हज़ार करोड़ से ज्यादा की रकम इन खातों में जमा कराई जा चुकी है. एक ऐसे समय में, जब भारत कैशलेस इकोनॉमी की तरफ बढ़ रहा है, पीएम मोदी का ये फैसला दूरदर्शिता से भरा कहा जा सकता है.


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पहले ही हो चुकी थी नए नोट छापने की तैयारियां : पिछले छह महीने से मोदी इस चक्रव्यू को रचने की तैयारी में थे. जिसके चलते ही पीएम ने जन धन योजना के तहत पहले हर आदमी को बैंक के खाते से जोड़ा, जिससे देश का सारा काम डेबिट कार्ड से हो और कालेधन की समानांतर व्यवस्था की जा सके. नतीजा यह हुआ कि  वित्त मंत्रालय के संयुक्त सचिव डॉ सौरभ गर्ग की सिक्योरटी में करोड़ों रुपये के 500 और 1000 रुपये के नोट की भरपाई के लिए 500 और 2000 रुपये के नए नोट पहले से ही छाप लिए गए. मगर इस बात की भनक किसी को न लगे, इसलिए गोपनीय तरीके से इन नोटों को छापने का काम किया गया.


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आईडीएस से घोषित की कई लोगों ने अपनी संपत्ति: सरकार ने अपने गेमप्लान को आगे बढाते हुए काले धन की वापसी के लिए इनकम डिक्लेरेशन स्कीम (आईडीएस) की शुरूआत की और 23 जुलाई से 30 सितंबर तक का समय अपनी संपत्ति घोषित करने के लिए दिया. पीएम ने खास तौर पर अपने इंटरव्यू में लोगों से ऐसा करने की अपील की जिसके चलते कई लोगों ने अपनी संपत्ति घोषित की और सरकार के खाते में 65.250 करोड़ रुपए आए. हालांकि सरकार इस योजना के परिणाम से ज्यादा संतुष्ट नहीं थी क्योंकि एक पैरेलल इकॉनमी अब भी मार्केट में मौजूद थी. रियल स्टेट, फेक करेंसी और आतंकवादी संगठनों पर ख़र्च किया जाने वाला पैसा इस योजना से नहीं आ सका.

काला धन रोकने के लिए बिल किए पास: देश-विदेश के काला धन धारकों पर शिकंजा कसने के लिए मोदी सरकार ने Benami Transactions Amendment Bill और Black money and Imposition Tax Act को भी शुरु किया.


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इतना बड़ा फैसला लेने से पहले देश के एटीएम और करोड़ों जनता के हाथों में नई करेंसी भी देनी थी. ताकि किसी को अचानक लिए गए इस फैसले के कारण परेशानी का सामना न करना पड़े. इसी के चलते रात 12 बजे से पुराने 500 और 1000 रुपये के नोट बंद होते ही, नई करेंसी अगले दो दिन के भीतर बैंक और एटीएम में डालने की प्लानिंग कर ली गई. बैंक में नोट बदलने गए व्यक्ति को अपना आधार कार्ड दिखाकर अपने बैंक में कैमरे की निगरानी में करेंसी बदलनी पड़ेगी, जिसके चलते कालेधन को छिपाने वाले वाले अरबपतियों पर अब शिकंजा कसा जा सकता है.

अगर समय के लिहाज से देखें, तो लोग कम खर्च करेंगे और खपत गिरेगी, उपभोग कम होगा. छोटे-मोटे कारोबारी, जिनका सारा बिजनेस नकद में होता है, उन्हें बहुत दिक्कत होने वाली है. पीएम मोदी के इस फैसले के पीछे चुनौतियां भी हैं और मजबूरियां भी. यह देखना दिलचस्प होगा कि मोदी सरकार अपने इस फैसले को भुनाने में कितना कामयाब हो पाती है.

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