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आतंकियों के हाथ परमाणु बम लगने की आशंका : अमेरिका के वॉल्टर ई. वाशिंगटन कन्वेंशन सेंटर के सभागार में जब रौशनी मद्धिम हुई और सिर के ठीक ऊपर लगे विशाल परदे पर फिल्म चलनी शुरू हुई, तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी समेत 50 राज्याध्यक्षों की निगाह एक साथ वहां जा टिकी. ये सभी नेता चौथे परमाणु सुरक्षा सम्मेलन में 1 अप्रैल को हिस्सा लेने के लिए वाशिंगटन डीसी में जमा हुए थे. इससे ठीक पहले अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने सभागार से मीडिया को बाहर भेज दिया था और वहां मौजूद नेताओं को सूचित किया था कि यह फिल्म आतंकवादियों द्वारा एक संभावित परमाणु हमले और उसके बाद पैदा होने वाली स्थितियों का आकलन करने के लिए बनाई गई है. इस फिल्म को देखना युद्ध पर आधारित किसी वीडियो गेम में हिस्सा लेने जैसा था जहां नेताओं को आसन्न परमाणु हमले पर अपनी प्रतिक्रियाएं देनी थीं.

फिल्म के एक दृश्य पर सभी का मुंह खुला का खुला रह जाता है जब आतंकवादी क्रॉप डस्टर उड़ा रहे होते हैं और चिकित्सा संस्थानों से प्राप्त जानलेवा रेडियोधर्मी पदार्थ का छिड़काव एक सघन रिहाइशी इलाके पर करते हैं जिससे लोगों में भयानक बीमारी फैलती है और उनकी मौत हो जाती है. फिल्म इस हल्के संदेश के साथ समाप्त होती है कि रेडियोधर्मी पदार्थों के इस्तेमाल से बड़े पैमाने पर जनता पर हमला करने की मंशा रखने वाले आतंकवादियों से इस दुनिया को कैसे निबटना होगा, जैसा कि फिल्म में अनुमान लगाया गया है.

एक रेडियोलॉजिकल डिसपर्सल डिवाइस (रेडियोधर्मी पदार्थ फैलाने वाला उपकरण) या लोकप्रिय भाषा में कहें तो डर्टी बम या शैतानी बम के घटक वही आइसोटोप होते हैं जिनसे कैंसर का इलाज होता है और ब्लड ट्रांसफ्यूजन संभव होता है. इन आइसोटोप को जब विस्फोटकों के साथ मिलाकर एक शहरी केंद्र के पास छोड़ दिया जाता है तो इससे होने वाले विस्फोट में आसपास रहने वाले लोगों की मौत हो जाती है. विस्फोट के बाद इससे होने वाला रेडियोधर्मी उत्सर्जन दो वर्ग किलोमीटर के दायरे में भयंकर बीमारियां फैला देता है-यह दिल्ली के कनॉट प्लेस जितना बड़ा इलाका हो सकता है-जिससे हजारों लोग बीमारियों की चपेट में आ सकते हैं. यह अपने पीछे इस इलाके में सक्रिय रेडियोधर्मी अवशेष छोड़ जाता है.

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आतंकियों के हाथ परमाणु बम लगने की आशंका

इससे भी बुरी बात यह है कि उक्त इलाके को बरसों तक घेर कर रखा जाता है जब तक कि आपदा प्रबंधन बल के लोग सुरक्षा कवच पहनकर उस इलाके को संक्रमण से पूरी तरह साफ नहीं कर देते. यह एक ऐसा परमाणु विनाश होगा जिसे यह दुनिया गवारा नहीं कर सकती. ऐसे किसी भी हमले के कई बरस बाद तक इसके मनोवैज्ञानिक, राजनैतिक और आर्थिक परिणामों को महसूस किया जाता रहेगा.

सभागार में फिल्म के दौरान मौजूद एक वरिष्ठ भारतीय अधिकारी ने इंडिया टुडे को बताया कि फिल्म खत्म होने के बाद मोदी उन शुरुआती नेताओं में थे जिन्होंने टिप्पणी की. उन्होंने कहा, “आतंकवादियों को ऐसे जनसंहारक हथियारों के इस्तेमाल से रोकने का इकलौता तरीका है अंतरराष्ट्रीय सहयोग और कार्रवाई, जिसमें सूचना और खुफिया जानकारियों का आदान-प्रदान शामिल हो तथा खतरे से निबटने के लिए बड़े पैमाने पर मानव संसाधन को तैयार किया जा सके.”

मोदी के बाद जितने भी नेताओं ने अपनी बात रखी, उन सभी का एक स्वर में कहना था कि ओबामा ने जिसे दुनिया के समक्ष अब तक मौजूद “सबसे बड़ी चुनौतियों में एक करार दिया है, उससे लड़ने का इकलौता तरीका सामूहिक कार्रवाई ही है. मुंबई, पेरिस और हाल में ब्रसेल्स और लाहौर में हुए हमले इस बात का साफ संकेत हैं कि आतंकवादी अब कहीं ज्यादा बड़े और चौंकाने वाले हमलों की फिराक में हैं. सम्मेलन में इस चिंता की तात्कालिकता को साफ महसूस किया जा रहा था.

आतंकवादियों का किसी परमाणु हमले का खतरा कितना गंभीर है, इसका पता अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (आइएईए) द्वारा जुटाई गई सूचनाओं से चलता है जिन्हें परमाणु और रेडियोधर्मी तत्वों के एक इन्सिडेंट ऐंड ट्रैफिकिंग डाटाबेस (आइटीडीबी) में सम्मिलित किया गया है. ताजा आंकड़े 31 दिसंबर, 2014 तक के उपलब्ध हैं, जिनके मुताबिक, आइटीडीबी ने दुनिया भर में 1993 से लेकर इस तारीख तक संवेदनशील परमाणु सामग्री और रेडियोधर्मी स्रोतों के अनाधिकारिक स्वामित्व और चोरी समेत संबंधित आपराधिक गतिविधियों के कुल 2,734 पुष्ट मामले सामने आए हैं. आइएईए का आकलन है, “आइटीडीबी में दर्ज घटनाएं दिखाती हैं कि परमाणु और अन्य रेडियोधर्मी सामग्रियों की तस्करी हो रही है और इनकी चोरी, लापता होने और अन्य अनाधिकारिक हरकतों जैसी समस्याएं बढ़ती जा रही हैं.”

अगली स्लाइड्स में जानिए भारत के परमाणु हथियार कितने सुरक्षित है 

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