कन्हैया के पिता के अंतिम शब्द – जो राष्ट्र का नहीं हुआ वो अपने बाप का क्या होगा

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पिता जब अपनी अंतिम साँसे ले रहा होता है तो उसकी आखिरी ख्वाहिश होती है कि वो अपने बेटे को दिल से दुवाएं दें आशीर्वाद दे. बेटा कितना भी नालायक क्यों न हो वो भी यही चाहता है कि अंतिम समय में उसके पिता उसके लिए आशीष भरे सुंदर वचन बोलें.

लेकिन जब बेटा कोई ऐसा कार्य करें जिसकी कल्पना तक उसके पिता ने न की हो. पिता खुद को अपराधी समझने लगे,उसको कहीं न कहीं ऐसा लगने लगे कि उसके द्वारा अपने बेटे को कहीं संस्कार देने में कोई कमी रह गयी हो. तो ऐसा बाप अंतिम समय में अपने बेटे के लिए “आशीर्वाद” नहीं बल्कि श्राप ही देगा.

जेएनयू के छात्र नेता कन्हैया कुमार जिन्होंने “कश्मीर की आजादी की मांग कर, हिन्दुस्तान से आजादी की मांगकर, भारत विरोधी नारे लगाकर रातोंरात कम्युनिस्ट, सेक्युलर और भारत विरोधी खेमें में शोहरत पायी हो” उसी कन्हैया कुमार के पिता जयशंकर सिंह के अंतिम शब्द थे
“जो अपने राष्ट्र का नहीं हुआ वो अपने बाप का क्या होगा”.
यह महज एक पंक्ति नहीं है बल्कि एक देशद्रोही बेटे के “देशभक्त” बाप की पीड़ा है.

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