इसरो ने सातवें नेवीगेशन सैटेलाइट ‘IRNSS 1 G’ को कामयाबी के साथ किया लॉन्च

1572

श्रीहरीकोटा, अप्रैल 28: इसरो ने गुरुवार को श्रीहरिकोटा से पीएसएलवी- सी 33 रॉकेट के द्वारा सातवें नेवीगेशन सैटेलाइट IRNSS 1 G को कामयाबी के साथ लॉन्च किया। इसी के साथ भारत ने स्वदेशी जीपीएस बनाने की मंजिल तय कर ली और भारत अमेरिका और रूस की कतार में शामिल हो गया है।

 

 

IRNSS 1 G अमेरिका आधारित ग्लोबल पोजिशनिंग सिस्टम यानि जीपीएस जैसी क्षमता रखता है । इसरो का PSLV C-33 रॉकेट अपने 35वें मिशन में IRNSS 1 G सैटेलाइट जब पृथ्वी की कक्षा में सफलता पूर्वक स्थापित हो जाएगा तब भारतीय वैज्ञानिकों को उनके 17 साल के कड़े संघर्ष का फल मिल जाएगा।

प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी लॉंच के पूरे कार्यक्रम पर निगरानी रख रहे थे । सैटेलाइट का नाम ‘नाविक’ रखते हुए जो कि मछुआरों को मछली पकड़ने के लिए कम से कम और सबसे अच्छा मार्गों के लिए पथ प्रदर्शन करेगा , प्रधान मंत्री मोदी ने कहा “ इस नयी तकनीक से हमारे लोगों को, हमारे मछुआरों फायदा पहुंचेगा । इसे विश्व ‘नाविक’ के नाम से जानेगी । हमारे प्रयासों से भारत ही नहीं बल्कि सार्क देशों को भी फाइदा पहुंचेगा। यह ‘मेक इन इंडिया, मेड इन इंडिया और मेड फॉर इंडियंस’ का उदाहरण है । 125 करोड़ भारतीयों को एक नया नाविक मिला है ।

 

इस स्वदेशी नेविगेशन प्रणाली से  स्थलीय, हवाई और समुद्री नेविगेशन की सहायता होगी साथ ही साथ वाहन पर निगरानी, आपदा प्रबंधन, मानचित्रण और भूगणितीय जानकारी निकालना, ड्राइवरों के लिए दृश्य और ध्वनि नेविगेशन के लिए भी सहायक सिद्ध होगा। इस सेवा को मोबाइल फोन के साथ भी एकीकृत किया जा सकता है और पैदल यात्रियों और पर्यटकों के लिए पाठ प्रदशन का उपकरण हो सकता है ।

 

इससे यातायात में काफी फायदा होगा साथ ही साथ भारत के दूर दराज के इलाकों की सही लोकेशन पता चल पाएगी। लंबी दूरी करने वाले समुद्री जहाजों को भी इससे फायदा पहुंचेगा । देशी नेवीगेशन सिस्टम चालू हो जाने के बाद से आम आदमी की जिंदगी को सुधारने के अलावा सैन्य गतिविधियों, आंतरिक सुरक्षा और आतंकवाद विरोधी गतिविधियों को कंट्रोल करने में भी ये बेहद उपयोगी होगा।

भारत का इंडियन रीजनल नेविगेशनल सैटेलाइट सिस्टम यानि IRNSS, अमेरिका के ग्लोबल पोजिशनिंग सिस्टम यानि जीपीएस और रूस के ग्लोनास को टक्कर देने वाला है। इस कामयाबी के साथ ही भारत का अपना न केवल उपग्रहों का जाल तैयार हो जाएगा बल्कि भारत के पास अपना जीपीएस सिस्टम भी हो जाएगा। वहीं अब जीपीएस के लिए भारत को दूसरे देशों पर निर्भर रहना नहीं पड़ेगा। साल 1999 में कार्गिल के दौरान भारत ने पाकिस्तानी सेना की लोकेशन जानने के लिए अमेरिका से जीपीएस सेवा की मांग की थी लेकिन अमेरिका तब भारत को आंकड़े देने से मना कर दिया था। उसी समय से भारतीय अंतरिक्ष वैज्ञानिक स्वदेशी जीपीएस बनाने की कोशिश करने लगे थे।

हालांकि वैज्ञानिकों का कहना है कि सिर्फ 4 सेटेलाइट से भी स्वदेशी GPS को चलाया जा सकता है लेकिन सातवें सेटेलाइट के अंतरिक्ष में जाने से पूरी तरह से सही और सटीक लोकेशन मिल पाएगी। स्वदेशी GPS के सक्रिय होने के बाद से देशभर में 1500 किलोमीटर के दायरे में 15 से 20 मीटर तक भी सटीक जानकारी मिलने लगेगी। भारतीय वैज्ञानिकों ने स्वदेशी जीपीएस सिस्टम के लिए पहला सेटेलाइट जुलाई 2013 में छोड़ा था और आज सातवां और आखिरी उपग्रह छोड़कर वो ये साबित कर देंगे कि जो काम विकसित देशों को करने में दशकों लग गए वो हमने सिर्फ तीन साल में ही कर दिखाया।

 

 

 

x
loading...
SHARE