क्या भारतीय ख़ुफ़िया एजेंसियों का खात्मा कर दिया गया है ?

क्या भारतीय ख़ुफ़िया एजेंसियों का खात्मा कर दिया गया है ? .अगर भारतवर्ष की वर्तमान हालत देखी जाय तो इसका अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं कि, भारत में ‘ख़ुफ़िया एजेंसी’ नाम की चीज खत्म हो चुकी है, कहाँ क्या हो रहा है या क्या होने वाला है, सरकार और प्रशासन को कोई खबर नहीं,

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एक बार कोई घटना हो तो ठीक है लेकिन बार बार वही हरकत जब लगातार दोहराई जाय तो इसका अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं कि, देश में वाकई गड़बड़ है, देश में फैली अशांति और असंतोष जल्द ही ‘गृहयुद्ध’ का रूप ले सकता है, .आये दिन देश के किसी न किसी कोने में आतंकी हमले, नक्सली हमले और भीषण दंगे लगातार हो रहे हैं लेकिन ख़ुफ़िया एजेंसियों और सरकारी प्रशासन का यहाँ कोई सकारात्मक रोल नहीं दिखता,


उसका कारण यह है कि, भारतीय ख़ुफ़िया एजेंसियों की सांगठनिक ढांचा ही ‘नालायक सरकारों’ ने खत्म कर दिया है, जब सरकारें नालायक होती हैं तो उसका हर ढांचा भी उसी के हिसाब से सेट हो जाता है,.आजकल की घटनाओं को देखें तो लगता है, अब ख़ुफ़िया एजेंसियों का रोल सिर्फ इतना रह गया है कि वे सिर्फ सत्ता में बैठे नेताओं की सुरक्षा देख लेती हैं, कोई इनपुट वगैरह मिल गया तो कभी कभार आतंकवादियों को पकड़ लिया करती हैं,


दुर्घटना संबंधी संभावनाओ की एडवांस में जानकारी रखना, उन्हें होने से रोकना, उसके लिए जिम्मेदार लोगों को समय से पहले पकड़ लेना, ऐसे कार्यों से ख़ुफ़िया एजेंसियां मीलों दूर हो गयी हैं, कश्मीर में आए दिन लगातार सेना कैंपों पर हमला, पठानकोट हमला फिर उड़ी हमला, आये दिन बड़े नक्सली हमले, कैराना शामली से हिन्दुओं का पलायन फिर अब बंगाल से हिन्दुओं का पलायन, बंगलादेशी घुसपैठियो का लगातार बढना, मस्जिदों मदरसों में जिहादियों को तैयार करना, विदेशियों का भारत में दखल देना,


इसी तरह के लगभग जितने भी क्षेत्र है हर जगह ख़ुफ़िया एजेंसियों की असफलता साबित हुयी है, अब यह नालायक सरकारों के कारण हैं या फिर ख़ुफ़िया एजेंसियां आलसी हो गयी हैं, इसका पता लगाना मुश्किल है, सरकारें और उनके नालायक सहयोगी तो खैर कुछ करने से रहे पर हमेशा से सच्ची भावना से ‘राष्ट्र के लिए समर्पित’ रहीं ख़ुफ़िया एजेंसियों के लिए यह सोचने का वक्त है कि, कैसे वे दिन पर दिन रसातल में जा रहे हैं ?

ravi-ojha

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