प्रधानमंत्री मोदी की अनूठी कूटनीति का गवाह बन रही दुनिया

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प्रधानमंत्री मोदी की अनूठी कूटनीति का गवाह बन रही दुनिया

मुंबई: आज के युग में यदि राजनैतिक, सामरिक, रणनीतिक और आर्थिक लिहाज से भारत की बात करें तो आजादी के बाद से 69 साल के इस युवा देश ने काफी तरक्की की है। भौगोलिक दृष्टि से यदि देखें तो हिन्द महासागर, बंगाल की खाड़ी व अरब सागर के बीच एक बहुत बड़ा भूभाग भारत के हिस्से में आता है और खुद भारत तीनों ओर से चीन, नेपाल, बांग्लादेश, म्यांमार, पाकिस्तान व श्रीलंका से घिरा हुआ है। यह स्थिति अंतर्राष्ट्रीय व्यापार व सुरक्षा लिहाजों से काफी अहम है और यह वैश्विक दृष्टिकोण से भारत की महत्ता को काफी महत्वपूर्ण बना देता है।

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वैसे भारत ने हमेशा से ही किसी बड़े देश के पलड़े में न पड़ते हुए या देशों के गुटों में शामिल न होते हुए अपनी सुरक्षा व राजनीतिक हितों को साधा है और आज भी खास तौर से संतुलन बनाते हुए अपनी गाड़ी पटरी पर बनाए हुए है।

उदाहरण के तौर पर ईरान व सऊदी अरब के आपस के संबंध कितने भी कटुतापूर्ण हो लेकिन भारत के साथ दोनों के रिश्ते मधुर हैं। जहां ईरान के साथ भारत ने हाल फिलहाल में अरब सागर से आगे व पाकिस्तान से सट कर ‘चाबहार’ बन्दरगाह के विकास हेतु करार किया वहीं दूसरी ओर भारत अपना 20% कच्चा तेल सऊदी अरब से आयात करता है और अब प्रधानमंत्री मोदी ने सऊदी अरब का दौरा भी किया है।

दूसरे उदाहरण की बात करे तो एक तरफ जहां भारत अरब देशों से परस्पर कई मुद्दों पर सहयोग करता आया है वहीं दूसरी ओर अरब देशों को न सुहाने वाले इस्राइल से भी कृषि, जल संचय तकनीक एवं सुरक्षा मसलों पर भारत की मैत्री है। भले ही सिमाई मसलों पर भारत की चीन के साथ लंबे समय से न बनती हो लेकिन दोनों देश आपसी व्यापार में 60 अरब डॉलर तक का आंकड़ा छू चुके हैं। कुछ इसी तरह भारत ने दो महाशक्तियों अमेरिका व रूस से भी अपने संबंध लगातार संतुलित ढंग से बेहतर बनाए रखे हैं। इन दोनों ही देशों के साथ भारत हथियारों की खरीद-फरोख्त से लेकर व्यापारिक संबंधों को भी प्रगाढ़ बनाए हुए है। यदि पाकिस्तान व चीन के चिंता की बात करें तो उसका भी इलाज भारत सकुशल ढंग से कूटनीतिक तरीकों के जरिये निकालता आया है और अब भी कर रहा है।

यदि हिन्द महासागर व भारतीय उपमहाद्वीप में भारत की सर्वभौमिक्ता व वर्चस्व को कम कर आँकने की कोशिश की गयी है तो उस पर भारत ने सामरिक-कूटनीतिक दांव खेलते हुए वक़्त वक़्त पर लगातार सैन्य अभ्यासों समेत अन्य चीजें कर के दिखाई हैं।

आइए बात करते हैं भारत द्वारा विभिन्न देशों संग किए जाने वाले सैन्य अभ्यासों की संक्षिप्त चर्चा कर लें:

भारत से लग कर हिन्द महासागर, अरब सागर व बंगाल की खाड़ी से अंतर्राष्ट्रीय व्यापार का एक बहुत बड़ा हिस्सा हो कर गुजरता है और ऐसे में समुद्री लुटेरों से लेकर अन्य कठिनाइयों से पार पाने व क्षेत्रीय शक्ति का संतुलन बनाए रखने के लिए जरूरी है कि भारत अपनी नौसैनिक शक्ति की धार तेज करता रहे।

भारत व फ़्रांस के नौसैनिक मिलकर हिन्द महासागर अथवा भू-मध्य सागर में जहां ‘वरुना’ नामक युद्धाभ्यास करते हैं वहीं कुछ सालों से भारत अपने पड़ोसी श्रीलंका के साथ मिलकर ‘स्लिनेक्स’ युद्धाभ्यास करता आ रहा है। मुश्किल समय के साथी रहे रूस के साथ भी भारत द्विवार्षिक तौर पर ‘इंद्रा’ नामक युद्धाभ्यास करता रहता है।

पिछले कुछ सालों में एशियाई-पैसिफिक महासागर में चीन के बढ़ते कद से चिंतित अमेरिका बहुत दिनों से एक ऐसे लोकतान्त्रिक देश को अपना साथी बनाने की इच्छा गाहे-बगाहे जताता रहा है जो कि इस समुद्री मार्ग से होने वाले अंतर्राष्ट्रीय व्यापार को भी सुचारु रखने में अहम किरदार निभाएगा तथा दक्षिणी चीन सागर में प्राकृतिक संसाधनों पर कब्जा जमाने के चीन के हेकड़ी को भी ठंडा करेगा। इस काम के लिए भारत के सिवा अमेरिका को इस क्षेत्र में कोई और देश सबसे उपयुक्त नजर नहीं आता। वैसे भी भारत अमेरिका के हितों से अधिक खुद के हितों की रक्षा करने व क्षेत्रीय संतुलन बनाए रखने की खातिर काम करना चाहता है।

इसी के मद्देनजर भारत पिछले कई सालों से ‘मालाबार’ युद्धाभ्यास अमेरिका के साथ समुद्री इलाकों में करता आया है और अब तो पिछले साल चीन के भौंह सिकुड़ने के बावजूद भी भारत और अमेरिका ने जापान को इसमें तीसरे देश के तौर पर शामिल करने का मन बना लिया। इससे एक और कदम आगे बढ़ते हुए पूरे एशियाई-पैसिफिक क्षेत्र में अमेरिका, भारत, जापान के साथ साथ ऑस्ट्रेलिया को भी नए रणनीतिक गठजोड़ के अंतर्गत शामिल करने की बात की जा रही है। वैसे भारत पहले से ही ऑस्ट्रेलिया संग द्विपक्षीय समुद्री युद्धाभ्यास करता आ रहा है जिसे ‘ऑसइंडेक्स’ कहा जाता है। जापान के साथ भी भारत अलग से ‘सहयोग-काइजीन’ कार्यक्रम करता है जिसमें दोनों देशों की कोस्ट-गार्ड शामिल होती है। ‘समुद्री-लुटेरों’ व तस्करी के खतरे को कम करने के लिए कोस्ट-गार्ड कर्मियों की बड़ी भूमिका होती है।

भारत की वायु सेना दुनिया में सबसे सकुशल मनी जाती है क्योंकि लेह-लद्दाख व सियाचिन जैसे हजारों फीट ऊंचे व ठंडे इलाकों से लेकर राजस्थान की तपती रेगिस्तान के ऊपर भी वे विमानों को उड़ा सकते हैं और दुश्मनों को भी उड़ा सकते हैं। अपनी इसी दक्षता को लगातार पैना करने के लिए भारतीय वायुसेना दूसरे देशों संग युद्धाभ्यास करती आई है जैसे फ्रांस संग ‘गरुड़ा’ तो रूस संग ‘एविया’ तथा ब्रिटेन संग ‘इंद्रधनुष’।

इसी तरह भारत की थल सेना भी श्रीलंका संग ‘मित्र शक्ति’, चीन संग ‘हैंड इन हैंड’, फ्रांस संग ‘शक्ति’, मंगोलिया संग ‘नोमैडिक एलिफ़ेंट’, नेपाल संग ‘सूर्य किरण’, अमेरिका संग ‘युद्धाभ्यास’ तथा सेशेल्स संग ‘लैमिटाई’ नामक युद्धाभ्यास करती रहती है।

कुल मिलकर यह तमान युद्धाभ्यास जहां दूसरे देशों के साथ क्षेत्रीय सुरक्षा व आतंकवाद के मुद्दे पर भारत की स्थिति मजबूत बनाए रखती है और आपसी तालमेल को बढ़ाती है वहीं दूसरी ओर पिछले दिनों एक और बात देखने को मिली।

भारत-अमेरिका के बीच रणनीतिक साझेदारी:

दरअसल, रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर ने पिछले साल के अंत में यानि दिसंबर माह में अमेरिका का महत्वपूर्ण दौरा किया था। इस दौरान उन्होने अमेरिकी रक्षा मंत्री ऐश कार्टर के साथ दोनों देशों के बीच हुए दस साल के नए सुरक्षा-रणनीतिक समझौते पर चर्चा की। अमेरिकी रक्षा विभाग यानि पेंटागन के अलावा वे उनके युद्धपोत आइसनहावर पर भी सवार हुए और कुछ लड़ाकू विमानों के परिचालन का भी निरीक्षण किया।

इतना ही नहीं, उनका यह दौरा इसीलिए भी अहम माना गया क्योंकि वे ऐसे पहले भारतीय रक्षा मंत्री बने जिन्होने प्रशांत महासागर के मध्य स्थित अमेरिका के महत्वपूर्ण सैन्य ठिकाने ‘यूनाइटेड स्टेट्स पैसिफिक कमांड’ (यूएसपैकोम) का दौरा किया। यहाँ वे सैन्य कमान के मुखिया एड्मिरल हैरी हैरिस से भी मिले और पर्ल हार्बर घटना की बरसी का भी हिस्सा बने। ज्ञात हो कि अमेरिका अपने प्रशांत महासागर स्थित इस सैन्य कमांड का दौरा करने का निमंत्रण कुछ गिने चुने विशिष्ट मेहमानों को ही देता है।

अमेरिका के साथ हुई बातचीत में जो एक और सबसे खास बात रही वह ये कि किस तरह भारत परिपूर्ण जेट इंजन तकनीक को हासिल कर सकता है। अमेरिका के साथ भारत की पिछले कुछ समय से जेट इंजन विमान तकनीक और गैस टर्बाइन तकनीक में सहयोग को लेकर बातचीत जारी है। इस पर विशेष कार्य समूह का भी गठन किया गया है। जैसा कि आज कल देखा जा रहा है कि दुनिया के ताकतवर देश अब पाँचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान विकसित कर चुके है और ऐसे में भारत पीछे नहीं रह सकता। वह आज भी रूस या फ्रांस द्वारा ली गयी मिग, जैगुआर, सुखोई एवं मिराज जैसे विमानों पर निर्भर है जो तीसरी पीढ़ी के हैं। वैसे हाल ही में भारत ने अमेरिकी सरकार व बोईंग कंपनी के साथ करार किया है जिसके तहत शिनुक परिवहन हेलीकॉपटर व अपाचे लड़ाकू हेलीकॉपटरों को भारत में ही निर्मित किया जाएगा।

इसी बीच कुछ दिनों पहले अमेरिका के रक्षा सचिव ऐश कार्टर ने भारत का महत्वपूर्ण दौरा किया और रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर संग तमाम सुरक्षा मुद्दों पर बातचीत की। जो एक बात खास निकल कर सामने आई वह यह कि दोनों देशों ने लॉजिस्टिक्स सपोर्ट एग्रीमंट पर हामी भरी यानि एक दूसरे के सैन्य बेसों का इस्तेमाल युद्धाभ्यास, रिफ़्यूलिंग व रिपेयरिंग के लिए।

जब लोगों ने इस पर अटकलें लगानी शुरू कर दी कि कहीं पाकिस्तान की ही तरह भारत बी अपनी सरजमीं का प्रयोग अमेरिका को करने देगा तो खुद कार्टर ने साफ कर दिया कि भविष्य में ऐसा कुछ भी नहीं होने जा रहा जब अमेरिकी सेना भारत की धरती पर उतरेंगी।

इस पर सुरक्षा विशेषज्ञ कर्नल (रिटा.) अभय पटवर्धन ने कहा, “भारत ने पहले ही अपनी स्थित स्पष्ट कर दी थी कि वह अपनी जमीन का प्रयोग उसके पड़ोसियों या दोस्तों पर हमलों के लिए नहीं करने देगा।” उन्होने आगे कहा कि इस समझौते का खाका बनने में 2-4 महीनों का वक़्त तो लगेगा ही लेकिन फिर भी यह कतई नहीं मान लेना चाहिए कि भारत अपनी संप्रभुता से कोई सम्झौता करने जा रहा है। यह तो सिर्फ बराबरी पर आधारित रणनीतिक साझेदारी है जिसमें कोई जबर्दस्ती की गुंजाइश नहीं रह जाती।

इसी पर थोड़ा और प्रकाश डालते हुए कर्नल (रिटा.) जयबंस सिंह ने बताया कि अमेरिका-भारत का रिश्ता इन दिनों बदलते अंतर्राष्ट्रीय व्यापारिक-राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में काफी तेजी से बढ़ रहा है। जाहीर है इसके कई कारण हैं जैसे दोनों देशों का लोकतान्त्रिक होना। और तो और सबसे बड़ी आर्थिक ताकतों में एक अमेरिका इस वक़्त भारत की तेज अर्थव्यवस्था से अभिभूत है और यहाँ निवेश करने का इच्छुक भी क्योंकि आज के वैश्वीकरण के युग में किसी भी देश के लिए भारत एक बड़ा ‘बाजार’ है।
कर्नल सिंह के मुताबिक एशिया-पैसिफिक महासागर में चीन के टेढ़े रवैये ने अमेरिका के नाक में दम कर रखा है और सुदूर पूर्वी क्षेत्र में जापान व दक्षिण कोरिया जैसे मित्रों के हितों की रक्षा करना भी उसकी जिम्मेवारी है। ऐसे में चीन का बढ़ता कद और दक्षिण चीन सागर में बड़े हिस्सों पर कब्जा करने की उसकी सनक ने अमेरिका को इस क्षेत्र में भारत के और नजदीक ला दिया है। ठीक ऐसा ही कुछ भारत अपने आसपास के समुद्रों पर अपना वर्चस्व जमाए रखने के लिए भी करना चाहता है और इसीलिए अमेरिका के साथ भारत का नया ‘रणनीतिक’ गठजोड़ दोनों के लिए हितकारक है व समय की मांग भी। इससे यह कदापि नहीं मान लेना चाहिए कि भारत अमेरिका के इशारों पर चलेगा बल्कि यह तो भविष्य में भारत के लिए काफी फायदेमंद साबित होगा। अमेरिका का भारत के निकट आना यानि सऊदी अरब से भी भारत की निकटता होना। उदाहरणार्थ: कल को यदि युद्ध छिड़ भी जाए तो भारत आज की स्थित के हिसाब से अकेले नहीं लड़ सकता और ऐसे में अमेरिका की सामरिक ताकत और सऊदी अरब की ऊर्जा दोनों ही हमारे काम आ सकेगी।

सेशेल्स के साथ भारत का रणनीतिक-व्यापारिक गठजोड़:

आपको ज्ञात होगा कि प्रधानमंत्री बनने के कुछ महीनों बाद ही नरेंद्र मोदी ने हिन्द महासागर स्थित श्रीलंका, सेशेल्स और मॉरीशस का दौरा किया था ताकि इन इलाकों में भारत के वर्चस्व से कुछ देशों को भलीभाँति अवगत भी करवाया जा सके साथ ही साथ अपने व्यापारिक-सामरिक हितों की भी रक्षा की जा सके।

India Seychelles Co-operation

दरअसल पिछले कुछ समय से इन समुद्री क्षेत्र में चीन कि दखलअंदाजी कुछ अधिक बढ़ गयी थी और ‘स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स’ योजना के बहाने महत्वकांक्षी चीन बांग्लादेश, श्रीलंका से लाकर सेशेल्स और मालदीव्स तक समुद्री इलाकों में अपनी पैठ बनाए जा रहा था। यहाँ तक कि इन देशों में व्यापारिक हितों की रक्षा व समुद्री डाकुओं से निपटने के नाम पर उसने उनके बन्दरगाहों पर अपने नौसैनिक जहाजों को तैनात करने की तैयारी भी कर ली थी।

इसी फंदे की काट निकालने के लिए भारत ने अब इन्हीं देशों से अपनी सदियों पुरानी मित्रता को नया आयाम देने की ठानी है। इस कड़ी में भारत ने सेशेल्स के दूर दूर तक फैले टापुओं पर 32 ‘अत्याधुनिक कोस्टल रडार गश्ती’ प्रणालियाँ स्थापित करने का काम शुरू कर दिया है जो कि खुद सेशेल्स को भी अपनी प्राकृतिक संसाधनों की रखसा करने में मदद करेंगे तथा भारत को भी इससे कई सारे लाभ होंगे। इस तरह के एक रडार स्टेशन का उद्घाटन खुद भारत के प्रधानमंत्री मोदी ने अपने दौरे पर किया था। भारत यहाँ अपनी एक नौसैन्य बेस को भी स्थापित करने जा रहा है।

इसके अलावा भारतीय नौसेना ने हाल ही में सेशेल्स के विशेष आर्थिक क्षेत्र में अपने पी-8I समुद्री निगरानी विमानों की तैनाती की। निगरानी का काम 20 मार्च-23 मार्च 2016 तक चला। निगरानी का कार्यक्रम भारत और सेशेल्स की सरकारों के बीच आपसी सहमति पत्र के अनुसार किया गया। भारतीय नौसेना ने अतीत में भी साल में दो बार सेशेल्स के ऊपर निगरानी के लिए अपने मिशन सक्रिय किये थे। इसके लिए नौसेना के जहाजों को तैनात किया गया था।

इन इलाकों में भारत एक बड़ा मुल्क है और इस तरह वह सेशेल्स जैसे छोटे देशों को भी सुरक्षा के नजरों से आश्वस्त करता है। भारतीय नौसेना की ताजातरीन तैनाती और तकनीकी रूप से बेहद उन्‍नत सामुद्रिक निगरानी विमानों को सेशेल्स भेजने से संकेत मिलता है कि भारत वहां के विशेष आर्थिक क्षेत्र की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए कृतसंकल्‍प है। इस तैनाती से सेशेल्स में अवैध गतिविधियों और समुद्री डकैती को रोकने में मदद मिलेगी। इसके अलावा हिन्‍द महासागर क्षेत्र में सुरक्षा और स्थिरता को बढ़ावा देने में मजबूती आएगी।

इंडिया-अफ्रीका फोरम सम्मिट:

भारत ने हाल ही में पिछले साल अक्टूबर माह में (26-29 अक्टूबर, 2015) करीब 54 अफ्रीकी देशों की मेजबानी की थी जो भारत-अफ्रीका शिखर सम्मेलन के तीसरे संस्करण का हिस्सा बनने आए थे। जाहीर है अफ्रीकी देशों के साथ भारत का बहुत पुराना संबंध रहा है फिर वो चाहे काले-गोरे और आजादी की लड़ाई की बात रही हो, आज के व्यापारिक मुद्दे की बात हो, आतंकवाद से लड़ाई की बात हो या फिर बीमारियों से लड़ने की बात। सामरिक व ऊर्जा के लिहाज से भी भारत का अफ्रीकी देशों के साथ परस्पर सहयोग का वातावरण बनाए रखना अति-आवश्यक है।

आज चीन की ही तरह तेजी से बढ़ रहे भारत की अर्थव्यवस्था को भी ऊर्जा की काफी जरूरत है और इसीलिए आफ्रिका के कुछ देशों में भारत की कंपनियों ने भी तेल-खनिज की खोज के लिए डेरे डाल रखे हैं। विकास की दौड़ में पीछे कई अफ्रीकी देशों को आज भारत की आईटी तथा अन्य कंपनियों समेत शिक्षा क्षेत्र की भी जरूरत है। आज जब चीन अफ्रीका के देशों में पैसे झोंक कर ढांचागत विकास के कामों को आगे बढ़ा रहा है और ऐवज में अपने सैन्य बेस बनाना चाहता है तो जिबूती, मिस्र, केन्या, दक्षिण अफ्रीका समेत अन्य देशों से भारत के संबंध और भी मजबूत बनाने जरूरी हो गए हैं।

कर्नल (रिटा.) जयबंस सिंह ने अफ्रीका के साथ भारत के बढ़ते रिश्तों को चिन्हित करते हुए कुछ बातें सामने रखीं। उन्होने बताया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार पिछली दौर की सरकार से कूटनीतिक मामलों में थोड़ी आगे बढ़ती आ रही है। भले वह अफ्रीकी देश हों या कोई और देश, भारत इन सभी के साथ ऊर्जा, सांस्कृतिक, व्यापारिक व रणनीतिक स्तर पर गठजोड़ को मजबूत बनाए जा रहा है।

कर्नल सिंह के अनुसार यह बात तो सर्वविदित है कि चीन अफ्रीकी देशों में भारी पैमाने पर निवेश किए जा रहा है और उसके लिए वहाँ सबसे आकर्षक चीज है ऊर्जा (तेल)। ठीक इसी तरह भारत भी अपनी बड़ी जनसंख्या व तेज दौड़ती अर्थव्यवस्था की रफ्तार को बनाए रखने के लिए ऊर्जा के नए स्रोतों की तलाश में है। ऐसे में बेशक अफ्रीकी महाद्वीप भारत की प्राथमिकता वाला स्थान बन गया है। प्रधानमंत्री मोदी व विदेश मंत्री सुषमा स्वराज इस बात को अच्छी तरह जानते हैं और अफ्रीकी देशों में ऊर्जा के स्रोतों का दोहन करने की रणनीति पर आगे बढ़ रहे हैं। भारत इसके बदले में वहाँ शिक्षा, मूलभूत सुविधाओं व व्यापार पर निवेश कर अपनी भागेदारी दर्ज करवा रहा है।

संयुक्त अरब अमीरात संग तेल-ऊर्जा क्षेत्र में नया दौर:

इसी साल की शुरुआत में भारत का दौरा करने वाले संयुक्त अरब अमीरात के डिप्टी सुप्रीम कमांडर तथा अबु धाबी के शहजादे मोहम्मद बिन जाएद अल नाहयान ने भारत के साथ रणनीतिक-व्यापारिक साझेदारी को नयी ऊंचाई देने की इच्छा जताई थी। पिछले साल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की यूएई यात्रा के बाद कुछ ही महीनों में उनके द्वारा यह यात्रा करना इस बात का सूचक है कि वे भारत के साथ रिश्तों को लेकर कितने गंभीर हैं। खुद मोहम्मद जाएद ने भारत के साथ रिश्तों को आर्थिक-व्यापारिक से बढ़कर सांस्कृतिक और सभ्यता के सतह पर जुड़ा हुआ बताया।

एक अनुमान के मुताबिक अबु धाबी इनवेस्टमेंट प्राधिकरण के पास सिर्फ निवेश के लिए ही 800 अरब डॉलर पड़े हुए हैं और उनमें से अकेले 75 अरब डॉलर यानि करीब 5 लाख करोड़ रु भारत के विभिन्न क्षेत्रों में निवेश करने का मन संयुक्त अरब अमीरात ने बनाया है।

इतना ही नहीं, वहाँ की राष्ट्रिय ऑइल कंपनी ऐडनॉक ने एक खास निर्णय लेते हुए पेशकश की है कि वैश्विक बाज़ारों में आए दिन तेल के चढ़ते-उतरते दामों के खतरे से बचने के लिए वह अपना तेल भारत के सामरिक तेल भंडारों में जमा करेगा और उसमें से कुछ दोबारा लेकर बाकी दो तिहाई भंडार तेल भारत को मुफ्त में दे देगा। ज्ञात हो कि भारत कर्नाटक के मैंगलुरु व पडुर में तथा आंध्रा प्रदेश के विशाखापटनम में विशाल भूमिगत तेल भंडारण व्यवस्थाएं बनवा रहा है ताकि आपातकाल के समय यह देश वासियों के काम आ सके। इनकी कुल क्षमता 50 लाख टन से भी अधिक होगी।

जैसे उदाहरण के तौर पर संयुक्त अरब अमीरात मैंगलुरु के 15 लाख टन की क्षमता वाले तेल भंडार केंद्र में ऐडनॉक आधी यानि 7.5 लाख टन तेल जमा करना चाहता है जो की लगभग 60 लाख बैरल के करीब बैठता है। इसमें से बाद में दो तिहाई भारत का होगा। फिलहाल कर समबन्धि विषयों समेत अन्य तकनीकी विषयों पर बातचीत चल रही है।

कुल मिलाकर इन सब उदाहरणों को देखा जाए तो भारत अपनी सूझ-बुझ भरी विदेशी नीतियों के साथ इस तरह आगे बढ़ रहा है कि बदलते वैश्विक तथा क्षेत्रीय राजनीति के परिप्रेक्ष्य में खुद की संप्रभुता एवं वर्चस्व बनाए रखे और सफलतापूर्वक विकास की दौड़ में तेजी बनाते हुए नए विश्व के निर्माण की अगुआई कर सके।

सभार : न्यूज़ भारती 

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