नारी शोषण की कुप्रथा है हलाला ?

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नारी शोषण की कुप्रथा है हलाला ?

मुस्लिम समुदाय में महिला यदि अपने लिए किसी अनहोनी से सबसे ज्यादा डरती है तो वो है तलाक, क्योंकि मात्र तीन शब्द उसके हँसते खेलते जीवन में अंधकार ला सकते है। ऐसा भी तो नहीं है कि चलो तलाक बोल दिया अगले दिन सॉरी कह दिया, या भूल सुधार कर ले और मामला टल जाये, नहीं! उसे उसी वक्त पति का घर छोडना पडेगा सोचों वो महिला कहाँ जाएगी? पिछले दिनों अफजल प्रेमी गेंग के लोग उमर खालिद की अगुवाई में जेएनयू के केम्पस में आजादी के नारे लगाये  थे| कह रहे थे कश्मीर में लेंगे आजादी, बन्दुक से लेंगे आजादी, हम लडकर लेंगे आजादी इस प्रकार के देश  विरोधी नारे लगने के बाद भी किसी कट्टरवादी उलेमा की ओर से निंदा आलोचना का कोई बयान नहीं सुनाई दिया। किन्तु अब जैसे ही तीन तलाक जैसी कुरीति से मुस्लिम महिलाओं की आजादी पर देश की सर्वोच्च अदालत में सुनवाई का मामला आया तो उलेमा और अल्पसंख्यक संगठन इसके समर्थन में उतर आये। तो मन में सवाल यह उठा कि मुस्लिम समाज की महिलाओं को आखिर तीन तलाक से कब मिलेगी आजादी?  तीन तलाक पर ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड और सुप्रीम कोर्ट की तकरार के बाद मुस्लिम समाज एक अजीब घालमेल करता नजर आ रहा है।

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जब सऊदी अरब और पाकिस्तान समेत कई मुस्लिम देशों में इस प्रथा पर पाबंदी लगा दी गई है तो भारत जैसे धर्मनिरपेक्ष देश में इस प्रथा को जारी रखने का क्या तुक है? बस इसलिए कि पुरुष को तो मनमानी का अधिकार है और महिलाओं को कोई अधिकार नहीं है इनका जीवन और भविष्य उनकी जुबान से तीन बार निकलने वाले इस कड़वे शब्द पर ही निर्भर है? क्या महज तीन बार तलाक शब्द के उच्चारण के साथ ही जीवनभर का बंधन टूट जाता है? क्या इस्लाम में महिलाओं का दर्जा, दोयम है? मुसलमानों के धर्मग्रंथ कुरान में किसी पुरुष  को अपनी पत्नी से अरबी भाषा का शब्द “तलाक” तीन बार दोहराकर शादी जैसे जीवन भर के को बंधन तोड़ने का हक बताया गया है| तलाक के बारे में कुरान की आयत के आधार पर हदीसों में इस प्रकार लिखा है, इमाम अल बगवी ने कहा है, यदि कोई व्यक्ति अपनी पत्नी से कहे की मैंने तुझे दो तलाक दिए और तीसरा देना चाहता हूँ,  तब भी तलाक वैध मानी जाएगी और विडम्बना देखिये सभी विद्वानों ने इसे जायज बताया है। हमारा उद्देश्य किसी समुदाय विशेष की आस्था पर चोट करना नहीं है| हमने पुराण से लेकर गीता की गलत व्याख्या पर हमेशा  सवाल खडे करते आये है| हम हमेशा मानवीय द्रष्टिकोण अपनाने की पैरवी करते है सब जानते है अब परिस्थिति पहले के अनुरूप नहीं रही इसलिए क्या अब हमें धार्मिक कानून से लेकर बहुत सारी कुरूतियों की पुन: समीक्षा की जरूरत नहीं है? भारत के मुसलमानों में पति फोन, एसएमएस संदेश  यहां तक कि फेसबुक जैसे सोशल मीडिया साइटों तक पर पत्नियों को तलाक देते आए हैं। एक नई रिपोर्ट दिखाती है कि महिलाएं अब इस चलन के खिलाफ आवाज उठाकर उसमें बदलाव लाना चाहती हैं।

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