मकर संक्रांति पर बाबा गोरखनाथ को क्यों चढ़ती है खिचड़ी, क्या है मान्यताएं?

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गोरखपुर: आज से चार दिन बाद 14 जनवरी को देश में मकर संक्रांति का पर्व मनाया जायेगा। देश के हिन्दू मतावलम्बियों द्वारा इस पर्व का जनवरी माह की शुरुआत से ही तैयारियां शुरू कर दी जाती हैं। इस पर्व के दिन पूर्वी उत्तर प्रदेश,बिहार,नेपाल के हिन्दू मतावलम्बियों द्वारा गोरखपुर स्थित बाबा गोरखनाथ मंदिर में चावल दाल की खिचड़ी के रूप में अपनी श्रद्धा शिव स्वरुप बाबा को अर्पित की जाती है।पूर्वी उत्तर प्रदेश के इस प्रमुख मंदिर में क्यों चढ़ाया जाता है खिचड़ी। क्या है इसका रहस्य,पढ़िए एक खास रपट:-

इस दिन से छह माह तक शुभ काम के लिए अतिश्रेष्ठ

सूर्य को जगत आत्मा माना जाता है। यह वर्ष पर्यन्त विभिन्न राशियों में प्रवेश कर संक्रमण करता है। विभिन्न राशियों में सूर्य के प्रवेश को संक्रांति कहते हैं। धनु राशि से जब मकर राशि में सूर्य प्रवेश करता है तो इसे मकर संक्रांति कहते हैं। मकर राशि में प्रवेश से लेकर मिथुन राशि तक छह माह के लिए सूर्य उतरायण रहता है। यह छह मास धार्मिक आयोजन किसी शुभ कार्य के लिए बेहद अच्छा माना जाता है। सूर्य के उतरायण होने पर रातें छोटी और दिन बड़ा होने लगता है। माघ मास में मकर संक्रांति पर पुण्य के लिए स्नान का विशेष महत्व है।हिंदी भाषी क्षेत्र में दाल व चावल के मिश्रण के दान व भोजन को संक्रांति कहते हैं। महाराष्ट्र में तिल व गुड़ का विशेष प्रयोग किया जाता है। बंगाल में इसे तिलवा संक्रांति कहते हैं जबकि दक्षिण भारत में तीन दिनों तक चलने वाला महोत्सव पोंगल कहलाता है

खिचड़ी पर्व और उससे जुड़े बाबा गोरखनाथ मंदिर से जुडी मान्यताएं :-

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किवदन्तियों के मुताबिक त्रेता युग में महान योगी गुरु गोरखनाथ भ्रमण करते हुए कांगड़ा जिले के ज्वाला देवी स्थान पर पहुंचे। वहां गोरखनाथ को आया देख स्वयं देवी प्रकट हुईं और स्वागत करते हुए भोजन ग्रहण करने का आमंत्रण दिया। देवी स्थान पर वामाचारी पंथ से पूजन होने की वजह से तामसी भोजन बाबा गोरखनाथ ग्रहण करना नहीं चाहते थे। इसलिए गोरखनाथ ने कहा कि वह खिचड़ी खाते हैं वह भी मधुकरी से।

बाबा की बातों को सुनकर देवी ने कहा कि वे भी खिचड़ी ही खाएंगी। उन्होंने बाबा गोरखनाथ से कहा कि तुम खिचड़ी की सामग्री मांगकर लाओ वह अदहन (चावल-दाल बनाने का गर्म पानी ) गरम कर रही हैं। गुरु गोरखनाथ भिक्षा मांगते हुए अयोध्या के इस क्षेत्र में अचिरावती (बाद में इरावती अपभ्रंसित होकर राप्ती नदी)के किनारे चारो तरफ जंगलो से घिरे शांत और मनोरम जगह से प्रभावित होकर गुरु गोरखनाथ ने यहीं समाधि ले लिए। बाद में हिमालय की तलहटी का यह क्षेत्र गुरु गोरखनाथ के नाम पर गोरखपुर कहलाया।

तभी से मान्यता है कि समाधि लिए गुरु गोरखनाथ के खप्पर में लोग खिचड़ी चढ़ाने लगे। न कभी खप्पर भरा और न ही वे वापस कांगड़ा लौटे। जनश्रुति है कि तभी से लोग आकर गुरु गोरख के खप्पर में खिचड़ी चढ़ाते हैं लेकिन आज तक वह खप्पर भरा नहीं। यहीं नहीं गुरु गोरखनाथ के इंतजार में ज्वाला देवी में आज भी अदहन खौल रहा है।

धीरे-धीरे बाबा के खिचड़ी की कहानी देश-विदेश में पहुंची और दूर-दराज से लोग यहां खिचड़ी चढ़ाने आने लगे।जहां लोगों के पूरे माह तक खिचड़ी चढाते रहने से मेले का आयोजन होने लगा। यह मेला एक माह तक चलता है।

पहली खिचड़ी नेपाल राजवंश की होती है अर्पित

मान्यता है कि नेपाल राजवंश गुरु गोरखनाथ की कृपा से अस्तित्व में आया। गुरु गोरख के आशीर्वाद से नेपाल राजवंश के संस्थापक पृथ्वीनारायण शाह देव ने बाईसी और चैबीसी नाम से बंटी 46 छोटी-छोटी रियासतों को संगठित नेपाल की स्थापना की थी। नेपाल के राजमुकुट, मुद्रा पर गुरु गोरक्षनाथ का नाम और उनकी चरण पादुका अंकित है। मान्यता है कि पहली खिचड़ी नेपाल राजवंश से ही आती है। जो मकर संक्रांति की शुरुआत होते ही बाबा को अर्पित की जाती है। इसके बाद से आमजनता के लिए मंदिर के पट खोल दिए जाते हैं।

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बाबा गोरखनाथ को शिवातार की मान्यता

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार बाबा गोरखनाथ आदिनाथ भगवान शिव के अवतारी थे। उनके गुरु मत्स्येन्द्रनाथ की उत्पत्ति मछली के पेट से हुई थी। मत्स्येन्द्र नाथ भिक्षाटन करते हुए सरस्वती नामक एक माता के दरवाजे पर पहुंचे। भिक्षाम देही कहकर भिक्षा मांगने लगे। बाहर निकली महिला उनको कुछ दुःखी दिखीं। उन्होंने इसका कारण पूछा। स्त्री ने बताया कि धन-दौलत सबकुछ भगवान ने दिया है लेकिन एक औलाद नहीं दिया। पीड़ा सुनने के बाद बाबा मस्त्येंद्रनाथ जी ने प्रसाद स्वरूप भभूत (राख़ से तैयार भस्म)दी और वहां से आगे बढ़ गए।

12 वर्ष बाद वह फिर उसी दरवाजे पर गए। भिक्षा के लिए पुकारा तो वही महिला बाहर निकलीं। महान योगी ने पूछा कि 12 वर्ष पहले उन्होंने जो भभूत दिया था उसका क्या फल रहा। इस पर महिला ने बताया कि पड़ोस की महिलाओं ने सन्देह पैदा कर दिया तो उन्होंने भभूत को झाड़ियों में फेंक दिया था। उन्होंने वह स्थान दिखाने को कहा। वहां पहुंच कर उन्होंने जोर से अलख निरंजन का उद्घोष किया। उद्घोष होते ही वहां 12 वर्ष के बालक प्रकट हुए जो बाद में गोरखनाथ के नाम से प्रसिद्व हुए। बालक को रखने का माता का अनुरोध ठुकराकर मत्स्येन्द्रनाथ उन्हें अपने साथ ले गए। गुरु के साथ योग सीखते बाबा गोरखनाथ इधर-उधर भ्रमण करने लगे।

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