जानिए आस्था के महापर्व छठ पूजा के बारे में, अपने इन मान्यताओं की वजह से है खास

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अपने मान्यताओं की वजह से खास छठ पर्व ( छठ पूजा) आस्था और भक्ति का प्रतीक है। सूर्योपासना के लिए प्रसिद्ध यह पर्व कुछ साल पहले तक मूलतः बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश और नेपाल के तराई क्षेत्रों में मनाया जाता रहा है, लेकिन अब यह लगभग पूरे भारत में प्रचलित और प्रसिद्ध हो गया है।

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छठ पूजा
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छठ पूजा

कार्तिक शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को मनाए जाने की वजह से इस पर्व को छठ पर्व (छठ पूजा) कहा गया है। वैसे तो यह पर्व साल में दो बार मनाया जाता है, लेकिन कार्तिक छठ का विशेष महत्व है। हिन्दू मान्यताओं के मान्यताओं के मुताबिक, संतान, पारिवारिक सुख-समृद्धि और मनवांछित फल-प्राप्ति के लिए श्रद्धालु यह पर्व धूमधाम से मनाते हैं।

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पर्व की शुरुआत नहाए-खाए से शुरू होती है। इसमें प्रथम दिन डूबते सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है, वहीं अगले दिन उगते हुए सूर्य की पूजा की जाती है।

इस पर्व में बांस से बने सूप, टोकरी, मिट्टी के बरतनों, गन्ने, गुड़, चावल और गेंहूं से बने प्रसाद की प्राथमिकता होती है। इस अवसर पर लोकगीतों के गायन की परम्परा है।

छठ पूजा के संबंध में कई मान्यताएं और पौराणिक कहानियां प्रचलित हैं। इस पूजा की शुरुआत कब हुई, इस संबंध में कई लोककथाएं कही जाती रही हैं, जो इस तरह हैं।

माता सीता ने की थी सूर्यदेव की पूजा

प्रचलित मान्यताओं के मुताबिक, इसी दिन देश में रामराज्य की स्थापना हुई थी। कार्तिक शुक्ल षष्ठी को भगवान राम और माता सीता ने उपवास किया और सूर्यदेव की आराधना की। सप्तमी को सूर्योदय के समय पुनः अनुष्ठान कर सूर्यदेव से आशीर्वाद प्राप्त किया था।

कर्ण ने भी की थी भगवान सूर्य की पूजा

एक अन्य मान्यता महाभारतकाल से जुड़ी हुई है। भगवान सूर्य के पुत्र कर्ण प्रतिदिन सूर्योपासना करते थे। पानी में खड़े होकर अर्घ्य देने की परम्परा की शुरुआत कर्ण ने ही की थी।

द्रौपदी भी करतीं थीं सूर्योपासना

मान्यताओं के मुताबिक, द्रौपदी भी सूर्योपासना करती थीं। अपने परिजनों के उत्तम स्वास्थ्य की कामना और लंबी उम्र के लिए वह नियमित सूर्य पूजा करती थीं। माना जा ता है कि जब पांडव अपना सारा राजपाट जुए में हार गए, तब द्रौपदीने छठ पूजा का व्रत रखा। तब उसकी मनोकामनाएं पूरी हुईं तथा पांडवों को राजपाट वापस मिल गया।

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