यहां कभी ठंड़ी नहीं पड़ती है चिताओं की आग, 24 घंटे जलती हैं लाशें

यहां कभी ठंड़ी नहीं पड़ती है चिताओं की आग, 24 घंटे जलती हैं लाशें

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वाराणसी. काशी में महाश्मशान मणिकर्णिका घाट पर सैकड़ों वर्षों से चिताएं जलती आ रही हैं। यह आज तक नहीं बुझी है। मान्यता है कि औघड़ रूप में शिव यहां विराजते हैं। काशी में मृत्यु और यहां दाह संस्कार करने से मरने वाले को महादेव तारक मंत्र देते हैं। यहां मोक्ष प्राप्त करने वाला कभी दोबारा गर्भ में नहीं पहुंचता है।
त्रिशूल पर टिकी है काशी
काशी विश्वनाथ मंदिर के प्रमुख अर्चक पं श्रीकांत मिश्र बताते हैं कि पुराणों और धर्म शास्त्रों में वर्णित है कि काशी नगरी भगवान शिव के त्रिशूल पर बसी है। मणिकर्णिका घाट की स्थापना अनादी काल में हुई है। श्रृष्टि की रचना के बाद भगवान शिव ने अपने वास के लिए इसे बसाया था और भगवान विष्णु को उन्होंने यहां धर्म कार्य के लिए भेजा था।
कैसे पड़ा कुंड का नाम
भगवान विष्णु ने हजारों सालों तक मणिकर्णिका घाट पर तप किया था। महादेव के प्रकट होने पर विष्णु ने अपने चक्र से चक्र पुष्कर्णी तालाब (कुंड) का निर्माण किया था। इससे पहले उन्होंने कुंड में स्नान किया था। इस दौरान उनके कान का मुक्तायुक्त कुंडल गिर गया था। इसी के बाद से इस कुंड का नाम मणिकर्णिका कुंड पड़ गया। इस कुंड का इतिहास, पृथ्वी पर गंगा अवतरण से भी पहले का माना जाता है।
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शिव देते हैं तारक मंत्र
पं शैलेश त्रिपाठी बताते हैं कि महाश्मशान मणिकर्णिका घाट महादेव का पसंदीदा स्थल था। मान्यता है कि बाबा विश्वनाथ और माता पार्वती अन्नपूर्णा के रूप में भक्तों का कल्याण करते हैं। दूसरी ओर शिव औघड़ रूप में मृत्यु को प्राप्त लोगों को कान में तारक मंत्र देकर मुक्ति का मार्ग देते हैं। मणिकर्णिका पर चिताओं की अग्नि इसी कारण हमेशा जलती रहती है।
क्या कहते हैं घाट के लोग
घाट पर रहने वाले बुजुर्ग नरेश बिसवानी का कहना है कि महादेव चिता की भस्म से श्रृंगार करते हैं। इसीलिए यहां चिता की आग कभी ठंडी नहीं पड़ती है। चौधरी परिवार के डब्बू का कहना है कि औसतन 30 से 35 चिताएं रोज जलती हैं। दाह संस्कार के लिए केवल बनारस से ही नहीं, बल्कि देश के कोने-कोने से लोग आते हैं। इसे मुक्तिधाम भी कहा जाता है।
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